श्रीराम का मनुष्यत्व और श्रीराम का ईश्वरत्व यह दो पक्ष है तथा इस सन्दर्भ में अलग-अलग मान्यताएँ हैं । गोस्वामीजी ने इसका बड़ा सुन्दर सामंजस्य करते हुए कहा कि श्रीराम को जब मनुष्य रूप में देखिए तो चरित्र देखिए और जब ईश्वर के रूप में देखिए तो लीला देखिए । गोस्वामीजी ने इसको एक सूत्र के माध्यम से बड़े सुन्दर ढंग से समझाया । रावण के अत्याचार से संत्रस्त होने के बाद देवताओं तथा ब्रह्मा ने मिलकर प्रार्थना की । तो अब प्रश्न यह है कि जिनसे प्रार्थना की जा रही है वे भगवान ईश्वर हैं कि मनुष्य हैं ? तो भी ! यह निश्चित बात है कि मनुष्य ईश्वर का आश्रय तभी लेता है जब उसके सामर्थ्य की सीमा समाप्त हो जाती है । तो यह तो स्पष्ट ही दिखाई दे गया कि ईश्वर का आश्रय तभी लिया गया जब मानवीय सामर्थ्य की सीमा समाप्त हो गयी । जब सारी सृष्टि व्याकुल हो गयी, मुनियों को भी लगा कि हम रावण के अत्याचार को समाप्त करने में असमर्थ हैं, जब स्वर्ग के देवताओं तक ने असमर्थता स्वीकार कर ली और यहाँ तक कि ब्रह्मा ने भी कह दिया कि रावण की समस्या का समाधान मेरे पास नहीं है, उस समय गोस्वामीजी एक बहुत बढ़िया बात कहते हैं - याद रखिए अगर श्रीराम को आप दो में से एक मान लीजिएगा तो घाटे में जरूर रहियेगा । केवल ईश्वर मानेंगे तो भी घाटे में रहेंगे और केवल मनुष्य मानेंगे तो भी घाटे में रहेंगे । गोस्वामीजी ने जो समन्वय प्रस्तुत किया, आप उस पर जरा ध्यान दीजिए ।
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