भगवान राम के चरित्र को आप यदि रामचरितमानस में देखें तो आपको यह लगेगा कि प्रभु के चरित्र में जहाँ मनुष्यत्व से काम नहीं चल सकता वहाँ पर ईश्वरत्व की भी आवश्यकता है । क्योंकि भई ! ईश्वरत्व यदि न होता तो रामायण में भगवान राम के कई जो कार्य थे वे अधूरे रह जाते । लेकिन साधारणतया भगवान राम बार-बार मनुष्य के समान ही व्यवहार करते हैं । हाँ ! यदा-कदा ईश्वरत्व भी दिखा देते हैं । जैसे कौसल्या अम्बा के सामने दिखाया । रामचरितमानस में लिखा हुआ है कि भगवान राम ने माँ के सामने विराट रूप प्रगट किया । यद्यपि विराट रूप दिखलाने के बाद भगवान को कहना तो यह चाहिए था कि अब तुमने तो पहचान लिया कि मैं ईश्वर हूँ, अब तो तुम्हें भ्रम नहीं होगा । किन्तु प्रभु ने ऐसा नहीं कहा । अपितु, गोस्वामीजी कहते हैं कि अपना ईश्वरत्व दिखाने के बाद कौसल्या अम्बा से हाथ जोड़कर कहने लगे - माँ ! मेरी प्रार्थना है कि यह बात आप किसी को मत बताइयेगा कि मैं ईश्वर हूँ । प्रभु का अभिप्राय था कि अगर मैं ईश्वरत्व न बताऊँ तो माँ ज्ञान से वंचित रहेगी, और यदि उन्होंने मुझे केवल ईश्वर ही मान लिया, तो मैं माँ के प्यार से वंचित हो जाऊँगा । और दोनों बातें बनी रहें, इसका उपाय यही है कि माँ को ज्ञान भी मिल जाय पर वह ज्ञान हमारे वात्सल्य में बाधक न बनने पाये । अगर माँ यह समझती रहीं कि यह साक्षात ईश्वर है तो न गोद में सुलावेंगी, और न ही मुझे दूध पिलावेंगी और न तो प्यार करेंगी, वरन ईश्वर समझ कर मेरी पूजा करने लगेंगी । इसलिए ज्ञान और प्रेम दोनों बना रहे ।
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