जब भगवान श्रीराम अयोध्या से यात्रा करते हैं तब सबसे पहले भगवान राम का मिलन केवट से होता है और इसके पश्चात यात्रा करते हुए भगवान श्रीराघवेन्द्र तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भरद्वाज के आश्रम में पहुँचते हैं । वहाँ रात्रि विश्राम करते हैं । प्रातःकाल त्रिवेणी में स्नान करने के पश्चात भगवान श्रीराघवेन्द्र महर्षि भरद्वाज के चरणों में प्रणाम करते हैं और उसके पश्चात श्रीराघवेन्द्र ने महर्षि से जो प्रश्न किया वह बड़ा ही अनोखा है, अद्भुत है । लगता है भगवान राम का (ईश्वर) का सारा व्यवहार बदला हुआ है । उसका श्रीगणेश केवट के प्रसंग से ही प्रारंभ हो गया था । जब भगवान श्रीराघवेन्द्र ने केवट से यह कहा कि केवट ! तुम मुझे पार उतार दो, तो वह भी एक नयी बात थी । क्योंकि भगवान की घोषणा तो यह है कि संसार-सागर में जो व्यक्ति डूब रहे हैं या संसार-सागर में जो पार उतरना चाहते हैं, मैं उन्हें पार उतारने वाला हूँ । लेकिन गंगा के किनारे कुछ उल्टी-सी बात करने लगे । संसार-सागर से पार करने वाला ईश्वर जब केवट से यह कहने लगता है कि मुझे पार उतार दो, तो सुनकर अविश्वास-सा होता है कि क्या यही ईश्वर की वाणी है ? और इसी प्रकार से महर्षि भरद्वाज से जब वे प्रश्न करते हैं तो भी ईश्वर का बदला हुआ रूप हमारे सामने आता है । वस्तुतः महर्षि भरद्वाज के चरणों में प्रणाम करने के पश्चात भगवान राम ने जो प्रश्न किया वह क्या है ?
....आगे कल से....
आज एक नये प्रसंग का प्रारंभ है, जिसका अमृत लाभ हम सबको आने वाले दिनों में नित्य प्राप्त होगा । परम पूज्य गुरुदेव भगवान से यही प्रार्थना है कि हम सबके जीवन में सत्संग की यह निरंतरता बनी रहे । जय सियाराम ।
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आज एक नये प्रसंग का प्रारंभ है, जिसका अमृत लाभ हम सबको आने वाले दिनों में नित्य प्राप्त होगा । परम पूज्य गुरुदेव भगवान से यही प्रार्थना है कि हम सबके जीवन में सत्संग की यह निरंतरता बनी रहे । जय सियाराम ।
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