Wednesday, 16 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीरामचरितमानस की विलक्षणता यह है कि इसमें एक सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया गया है । श्रीरामचरितमानस के वैसे तो अनेक श्रोता और वक्ता हैं, पर एक वक्ता और श्रोता के रूप में जो नाम चुना गया है वह बड़ा अनोखा है । वे वक्ता हैं काकभुशुण्डि तथा श्रोता हैं - गरुड़ । भगवान शंकर ने पार्वती जी को अपना संस्मरण सुनाते हुए कहा, पार्वती ! जब सती-शरीर में मेरा तुम्हारा वियोग हो गया तब भ्रमण करते हुए मैं सुमेरु पर्वत पर पहुँचा, वहाँ मैंने एक अनोखा दृश्य यह देखा कि वृक्ष के नीचे एक कौआ बैठा हुआ कथा कह रहा था । वैसे चुनाव भी  बड़ा अनोखा किया गया । क्योकिं अगर वक्ता का कण्ठ मधुर हो तो सुनने वालों को बड़ा रस आता है । यदि कोई सुन्दर कण्ठ से पाठ करे तो आनंद आता है । पर व्यंग्य यह है कि पक्षी चुना भी तो कौआ । अगर कोई सबसे कर्कश कण्ठ वाला पक्षी माना जाता है तो कौआ ही है । एक और विचित्र विडम्बना यह है कि पक्षियों में सबसे निम्न कोटि का पक्षी भी कौआ ही माना जाता है और शंकरजी ने जब यह कहा कि कौआ कथा कह रहा था, तो पार्वतीजी ने पूछा कि जब कौआ कथा सुना रहा था तो वहाँ पर सुनने वाले भी कौए ही रहे होंगे ? भगवान शंकर ने कहा - नहीं पार्वती ! यही तो आश्चर्य है । मैंने जब जाकर देखा तो दिखायी यही पड़ा कि जितने हंस थे वे श्रोता बनकर बैठे हुए थे और कौआ कथा सुना रहा था । बड़ी विचित्र-सा भाषा है कि कौआ कथा कहता है, और हंस कथा सुनते हैं । पार्वतीजी को यह भी संदेह था कि जब कौआ बोलता होगा तो अपने ही कर्कश कण्ठ से बोलता होगा । पर शंकरजी ने उत्तर देते हुए एक विशेष शब्द जोड़ दिया । शंकरजी ने कहा - पार्वती ! कौआ बड़े मधुर शब्दों में बोला । कहने का अभिप्राय यह है कि स्वर की मधुरता से यदि अगर रामकथा मधुर लगे तो फिर यह संदेह होना स्वाभाविक है कि उसमें स्वर की कितना मिठास है और रामकथा की मिठास कितनी है ? पर जब कौए के स्वर में भी सुनकर रामकथा मीठी लगे तब मिठास रामकथा की ही है, उसमें और कोई वस्तु मिली हुई नहीं है । शंकरजी ने कहा कि रामकथा का महात्म्य यही है कि वह कौए के कर्कश कण्ठ को भी इतना मधुर बना देती है कि वह सुनने में सुस्वर और अत्यंत मधुर प्रतीत होता है ।

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