हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने गये पर वे दवा को पहचान नहीं पाए । तब पूरा पर्वत ही उठाकर चल पड़े । मार्ग में उनका मिलन अयोध्या में श्रीभरत से होता है । प्रभु ने हनुमानजी से पूछा - हनुमान, तुम्हारा अयोध्या जाने का विचार कैसे हुआ ? उन्होंने कहा - महाराज ! मेरा विचार थोड़े ही हुआ, वह तो आपने मुझे भेज दिया । क्यों ? आपने जब देखा कि लक्ष्मण तो अस्वस्थ हैं ही और उनकी दवा लाने वाला स्वयं बीमार हो रहा है । उसकी भी चिकित्सा कराने के लिए किसी-न-किसी के पास तो भेजना ही चाहिए । तो आपने मुझे चिकित्सा के लिए भरतजी के पास भेज दिया था । भगवान राम और भरतजी की भूमिका तो आप जानते ही हैं । भगवान राम ईश्वर हैं और श्रीभरत मूर्तिमान प्रेम । हनुमानजी जब गये तो भगवान को प्रणाम करके गये थे - भगवान श्रीराम के चरणों को ह्रदय में रखकर गए थे । पर जब अयोध्या से लौटने लगे तो उन्होंने कुछ बदल दिया । तब उन्होंने भगवान के चरणों में प्रणाम नहीं किया, श्रीभरत के चरणों में प्रणाम किया । प्रभु ने पूछ लिया - क्या अयोध्या जाकर तुमने मन्त्र बदल दिया ? इष्ट बदल लिया ? मेरे चरण भूल गए ? हनुमानजी ने कहा - प्रभो ! मुझे आपके स्थान पर श्रीभरत के चरणों का आश्रय इसलिए लेना पड़ा कि जब मैं आपके चरणों का आश्रय लेकर चला तो अहंकार की छाया आ गयी थी और वह छाया श्रीभरत की भुजाओं की कृपा से मिटी । इसलिए मैं समझता हूँ कि आपके चरणों की अपेक्षा भरतजी की भुजाएँ कहीं अधिक समर्थ हैं । अभिप्राय यह है कि ईश्वर का आश्रय लेने के बाद भी बुराई पूरी तौर से तब तक नहीं मिटेगी, जब तक हम प्रेम का आश्रय नहीं लेंगे । भगवतप्रेम की परिपूर्णता जब जीवन में आती है तब मानसिक दोषों का निराकरण अपने आप हो जाता है ।
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