रावण के अत्याचार से संत्रस्त होने के बाद पृथ्वी और देवता जब ब्रह्मा के पास गये, तब ब्रह्मा ने पहला वाक्य कहा - पृथ्वी, देवताओं, मुनियों ! मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं पृथ्वी बना सकता हूँ, रावण का निर्माण कर सकता हूँ, पर इसके बाद भी रावण को नियंत्रित करना मेरे वश की बात नहीं है और तब ब्रह्मा ने एक बड़ा ही सुन्दर सूत्र दिया । यद्यपि ब्रह्मा यह कह सकते थे कि मनुष्य के सामर्थ्य की सीमा समाप्त हो गयी है । उसे सुनकर मनुष्य को बड़ी निराशा हो जाती कि हम कुछ नहीं कर सकते । पर ब्रह्मा ने कहा कि नहीं, जितनी हमारी सामर्थ्य है, उस सामर्थ्य का हम सदुपयोग करें । अगर न करें, तो भी हम सही मार्ग पर नहीं हैं । निष्क्रिय होकर सामर्थ्य और पौरुष का प्रयोग न करना भी व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं है । लेकिन जब सारे पुरुषार्थ की सीमा समाप्त हो जाय तो उस समय अगर हमारी वृत्ति ईश्वर की ओर न जाय तो भी हम सही नहीं हैं । तो बुद्धि के देवता ब्रह्मा ने सूत्र दिया कि पृथ्वी ! घबराने की आवश्यकता नहीं है । कहा - पृथ्वी ! मैं भी अविनाशी नही हूँ, तुम भी अविनाशी नहीं हो, हम सब नाशवान हैं । पर इस विनाशी के पीछे जो अविनाशी तत्व है अब उसकी ओर ध्यान दो, वह मेरा भी सहायता करेगा, तुम्हारी भी सहायता करेगा । और लिखा हुआ है कि तब ईश्वर की प्रार्थना प्रारंभ हुई । यही साधना का क्रम है । सामर्थ्य की सीमा समाप्त हुई, बुद्धि ने ईश्वर की ओर इंगित किया । और जब प्रेमपूर्वक ईश्वर की प्रार्थना की गई तब अन्त में आकाशवाणी हुई - ईश्वर ने कहा कि मैं जाऊँगा और तुम्हारे लिए मनुष्य बनूँगा ।
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