समुद्र-मंथन के लिए देवताओं ने भगवान से कहा कि महाराज, मन्थन तो हम लोग करेंगे, पर इसके लिए मथानी किसकी बनेगी और मथानी को चलाने के लिए रस्सी कौन-सी होगी ? तो भगवान ने संकेत किया कि मन्दराचल पर्वत को मथानी बनाओ । यह सूत्र बड़े महत्व का है । यह मन्दराचल शब्द बना कैसे है ? मन्दर और अचल, इन दो शब्दों को मिलाकर यह मन्दराचल शब्द बना है । अचल का अर्थ है, जो चलता नहीं, जो डिगता नहीं है । मन्दराचल पर्वत है, वह अचल है, अडिग है । जब उस पर्वत को मथानी बनाया जायेगा तो वह अचल रहेगा या चलेगा । उस मथानी को चलाना होगा । भगवान बड़ी अनोखी बात कहते हैं । मन्दर तो है अचल, अब इस अचल मन्दर को किस तरह चल बनाना है ? यह मन्दर क्या है ? गोस्वामीजी कहते हैं - विचार ही मन्दराचल पर्वत है । विचार के साथ वही समस्या जुड़ी हुई है कि जहाँ विचार आता है, वहाँ पर स्थिरता आ जाती है और विचार जहाँ स्थिरता के रूप में रहे, तो कई लोग यह कहकर प्रशंसा करते हैं कि ये तो अपने विचारों पर अडिग हैं, स्थिर हैं । पर याद रखिए, विचारों का अडिग और स्थिर रहना ही गुण नहीं है, उसे जरा गतिशील भी बनाइए । यह जो विचार है, उसको हम कर्म के साथ जोड़कर गतिशील करें । भगवान का अभिप्राय यह था कि आप कर्म कीजिए, केवल विचार के कारण कहीं आपके जीवन में जड़ता न आ जाए । मनुष्य जब विचारक बन जाता है, तो कभी-कभी उसमें जड़ता आ जाती है ।
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