Sunday, 31 January 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

जो लोग सिंहासन पर बैठ जाते हैं, वे प्रायः शीशा देखना छोड़ देते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि सिंहासन पर बैठने के बाद तो शीशा देखना और भी जरूरी हो जाता है । पहले जितना देखते थे, उससे कहीं और अधिक शीशा देखने की आदत डालनी चाहिए । क्योंकि जो व्यक्ति सिंहासन पर नहीं है, वह तो केवल अपने अथवा अपने परिवार के लिए है; परन्तु जो सिंहासन पर है, उस पर तो सारे समाज, सारे देश का उत्तरदायित्व है । अतः जिस व्यक्ति का संबंध अनेक व्यक्तियों से तथा समाज से जुड़ा हुआ है, उसे तो सजग होकर स्वयं पर दृष्टि डालनी चाहिए कि हम सही हैं या नहीं ? हमारे क्रियाकलाप ठीक हैं या नहीं ? इस प्रकार यहाँ तीन बातें कही गयी हैं - सार्वजनिक रूप से शीशा देखना, सिंहासन पर बैठकर शीशा देखना और प्रशंसा सुनते समय शीशा देखना, ये तीनों बड़े महत्व की और प्रेरणादायी हैं । प्रशंसा सुनते समय अर्थात दूसरों की आंख से अपने को देखना और शीशा देखने का अर्थ है अपनी आँख से स्वयं को देखना । दूसरों की आंख से अपने आपको देखने का अर्थ है, दूसरों द्वारा की गयी प्रशंसा को ही अपना वास्तविक स्वरूप समझ बैठना और इन प्रशंसा करने वालों का क्या ठिकाना ?

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