गोस्वामीजी ममता की तुलना दाद से करते हैं । दाद एक विचित्र रोग है । उसकी एक विशेष प्रकृति है । जिन लोगों को यह रोग होता है, उन्हें लगता है कि दवा के द्वारा तत्काल आराम मिल गया पर उन्हें यह भी अनुभव होगा कि यह बार-बार लौट आता है । कुछ दिन बाद फिर प्रकट हो जाता है । ममता की प्रकृति भी ठीक ऐसी ही है और यह सर्वाधिक चिरस्थायी रोग है । पर समाज में इसके प्रति कोई घृणा नहीं है, उतनी निंदा की वृत्ति नहीं है जितनी अन्य दुर्गुणों के प्रति है । ममता जन-जीवन में बड़ी व्यापक रूप में बैठी हुई है । इसे दूर कर पाना सरल नहीं है । भले ही वह साधारण रोग प्रतीत होती हो परन्तु वस्तुतः ऐसा नहीं है । इसलिए इस प्रसंग में गोस्वामीजी ने ममता की तुलना दाद से की है । लेकिन इसकी विचित्रता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने इसे अन्य प्रसंगों में कई रूप में प्रस्तुत किया है । एक प्रसंग में वे कहते हैं कि ममता अँधेरी रात है, और दूसरे प्रसंग में कहते हैं कि यह बन्धन है । फिर तीसरे प्रसंग में वे कहते हैं कि ममता मल है । ये बड़े कठोर निन्दा के शब्द हैं । परन्तु गोस्वामीजी ऐसा भी मानते हैं कि ममता का अन्त में विनाश होता है । उनका एक प्रसिद्ध पद है, जिसे भक्त बहुधा गाते हैं । गोस्वामीजी व्याकुल होकर बड़े ही निराशा भरे स्वर में गाते हैं - "ममता तू न गई मेरे मन से" - सब तो चला गया पर अरी ममता, तूने अभी तक मेरे मन का परित्याग नहीं किया । और मानस में वे कहते हैं - ममता पूर्ण अँधेरी रात है, वह तभी तक जीव के मन में बसती है जब तक प्रभु के प्रतापरूपी सूर्य का उदय नहीं होता ।
No comments:
Post a Comment