जब सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग कहते हैं तब इसका एक अर्थ तो यह होता है कि इतने वर्ष तक सतयुग, इतने वर्ष तक त्रेता, इतने वर्ष तक द्वापर और इतने वर्ष तक कलियुग रहेगा । पर ये चारों युग सतयुग में भी होते हैं, और त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में भी होते हैं । और केवल चारों युगों में ही नहीं बल्कि हमारे आपके जीवन में भी नित्य चारों युग आते हैं । जिस समय हम जिस युग की मनःस्थिति में रहते हैं, उस समय हमारे जीवन में वही युग रहता है । एक ही स्थान पर बैठे हुए अलग-अलग लोगों को अलग-अलग युग की अनुभूति होती है । जो कथा में बैठे हुए हैं, वे किस युग में बैठे हुए हैं ? जिनकी दृष्टि किसी दूसरे के जूते पर लगी हुई है वे कलियुग में ही तो बैठे हुए होंगे । तात्पर्य यह है कि शरीर चाहे जहाँ हो, व्यक्ति का मन जिस युग की मनोभूमि पर होगा वह उसी युग में विद्यमान होगा । तो राम जब अयोध्या से निकाल दिए गये वह क्या त्रेतायुग था ? मन्थरा के द्वारा कैकेयी के अन्तःकरण में जो विकृति उत्पन्न की गई, वह क्या त्रेतायुग का लक्षण है ? वस्तुतः वह त्रेता में कलियुग आ गया था । कलियुग का जैसा लक्षण है वह सारा का सारा वातावरण वहाँ बन गया था । गोस्वामीजी कहते हैं कि श्रीभरत तो कलियुग वालों के लिए हैं । उन्होंने कलियुग की समस्याओं का जो समाधान दिया है वह अन्य किसी ने नहीं दिया ।
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