भरतजी जब ननिहाल से लौटकर आए और अयोध्या का समाचार सुना तो समझ गए कि कैकेयीजी को ममता का दाद रोग हो गया है । उन्होंने तुरन्त चिकित्सा प्रारंभ की । बड़े कठोर शब्दों में जोर से फटकारा । बड़ी तीव्र भर्त्सना की ओर उनके इस शुष्क और कठोर व्यवहार का बड़ा सुन्दर परिणाम हुआ । कैकेयीजी ने जब भरत की फटकार सुनी तो भरत तो आँखों से ओझल हो गए और मन की आँखों के सामने राम आ गए । याद आने लगा कि वन जाते समय राम ने क्या कहा था । जिसको मैंने वनवास दिया, उसने मुझे क्या कहा और जिसको राज्य देने के लिए मैंने इतना अनर्थ किया, कुयश लिया, कलंक लिया, विधवा बनी, वह क्या कह रहा है ? राम ने तो मुझे जननी कहकर पुकारा था, कहीं राम का सम्बोधन ही तो ठीक नहीं था ? सचमुच भरत मेरा बेटा नहीं है । सचमुच मैंने पुत्र को पहचानने में भूल की । अब तो सचमुच संसार में मेरा कोई भी अपना नहीं है । पति से परित्यक्ता, समाज से तिरस्कृता, पुत्र के द्वारा सम्बन्ध की अस्वीकृति । सब जगह से उनके नाते टूटे हुए हैं । एक आशा की डोर बँधी हुई थी भरत से ; लेकिन भरतजी ने उसे भी बलपूर्वक तोड़ दिया । नाता तोड़ने देने के बाद भी भरतजी बड़े सावधान थे । उन्होंने जीवन भर कैकेयी को फिर कभी माँ कहकर नहीं पुकारा ? वैद्य मानते हैं कि पथ्य-कुपथ्य सबके अलग-अलग होते हैं । भरतजी ने देखा कि एक बार तो इस ममता के संस्कार ने इतना अनर्थ किया, अब फिर से मैं यदि माँ कहकर पुकारुँगा तो कुपथ्य पाकर रोग फिर से जाग उठेगा । इस रोग का क्या ठिकाना, थोड़ी-सी नमी पाकर फिर उभर सकता है और यदि यह ममता फिर से उभर गई, तो माँ का कल्याण नहीं है । इसलिए निर्णय कर लिया कि माँ के जीवन से ममता को पूरी तरह मिटा देना होगा ।
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