भगवान राम ममता के उस पक्ष की ओर संकेत करते हैं, जहाँ पर ममता बन्धन का रूप लिये हुए है । विभीषण ने तो ममता को अँधेरी रात के रूप में प्रस्तुत किया पर भगवान राम ममता की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि विभीषण ! मेरी दृष्टि में ममता पतले धागों की तरह है । और ये पतले धागे बिखरे हुए हैं । वास्तव में ममता को इतनी हेय दृष्टि से देखने की आवश्यकता नहीं है । व्यक्ति इस ममता का सदुपयोग भी कर सकता है । भगवान राम ने बड़ी मनोवैज्ञानिक बात कही । यदि व्यक्ति को यह कह दिया जाय कि तुम ममताशून्य हो जाओ, तब तो उसका अन्तःकरण नीरस हो जाएगा । क्योकि व्यक्ति में रस लेने की जो प्रकृति है, वह तो ममता से जुड़ी हुई है । ममता की इस प्रवृत्ति को - इन सब बिखरे धागों को अगर एक साथ एकत्र कर दिया जाय तो वे ही धागे रस्सी में परिणत हो जाएँगे । और तब उस रस्सी से किसे बाँधेंगे ? भगवान राम बड़े उदार हैं । यदि वे यह कहते कि फिर उस रस्सी से चाहे जिसको बाँधों तो और बात थी, पर उन्होंने दूसरों को बाँधने की बात नहीं कही । वे कहते हैं कि रस्सी से तुम चाहो तो मुझे भी बाँध सकते हो । अपने बँधने का उपाय भगवान स्वयं बता रहे हैं - माता-पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र, परिवार इन सबके प्रति ममता के धागों को मिलाने से जो रस्सी बने, उसे मेरे चरणों में बाँध दो । इसका परिणाम क्या होगा ? भगवान कहते हैं कि मैं तुम्हारे ममता के बंधन में बँध जाऊँगा ।
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