गुरु वसिष्ठ और श्रीभरत के दर्शन में बड़ा अन्तर है । गुरु वसिष्ठ कहते हैं - पिता ने तुम्हें राज्य दिया है, तुम राज्य लेने के बाद अगर इसे नहीं रखना चाहते, तो तुम्हें अधिकार है कि तुम इसे किसी दूसरे को दे सकते हो । अभी तुम राज्य ले लो और चौदह बरस बाद जब राम आएँ, तब उन्हें दे देना । पर श्रीभरत ने क्रम को उलट दिया । मानवीय दृष्टि से व्यक्ति में ऐसी दुर्बलता आती है कि एक बार राज्य भोग कर लेने के बाद उसे लौटा देने की स्थिति आए, तो हो सकता है कि व्यक्ति उसमें उलझ जाए । लेकिन भरतजी तो इस दुर्बलता से न केवल मुक्त हैं, बल्कि वे इससे भी बहुत उन्नत हैं । वह इस प्रकार कि जैसे कोई पहले कीचड़ लगा ले और फिर उसे धोए । श्रीभरत का अभिप्राय यह है कि पहले मैं अपने आपको राज्य का स्वामी मानूँ और अपने को स्वामी मान कर राज्य दूसरे को दूँ ? अगर भोगवृत्ति आ जाय तो मैं राज्य न दूँ, और भोगवृत्ति न आए तो राज्य दे दूँ ? तो देने के पश्चात मेरे अन्तःकरण में देने - दान करने - का गर्व होगा या नहीं ? क्या मेरे अन्तःकरण में यह वृत्ति नहीं आएगी कि मैंने इतना बड़ा राज्य राम को दे दिया ? यदि मैं भी अभी राज्य ग्रहण करुँ तो ममताग्रस्त होऊँगा और बाद में जब राज्य दूँगा तो अहंताग्रस्त होऊँगा । तो ऐसी परिस्थिति में सबसे अच्छा यह है कि अहंता और ममता, दोनों को प्रभु के चरणों में अर्पित कर दें और इसीलिए उन्होंने अहंता और ममता को सचमुच चित्रकूट में श्रीराम के चरणों में अर्पित कर दिया । और चित्रकूट से वे क्या लेकर लौटे ? वही, जिससे न अहंता रहे और न ममता । भगवान राम ने कह दिया - भरत, तुम्हें तो लौटकर राज्य चलाना है, प्रजा की, समाज की सेवा करनी है ।
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