श्रीभरत यह समझ गए कि कैकेयी के अन्तःकरण में ममता का संस्कार नहीं मिट पा रहा है और जब तक उनका यह ममत्व दूर नहीं होगा, तब तक उनका कल्याण नहीं हो सकता । इसलिए उन्होंने यह निर्णय लिया कि इनके ममत्व को दूर करना ही होगा और उनके इस ममता-दाद की चिकित्सा उन्होंने अपने शुष्क व्यवहार से ही प्रारंभ की । कैकेयीजी के प्रति उनके शुष्क व्यवहार का अभिप्राय यही था कि व्यवहार में आर्द्रता कैकेयीजी के लिए कुपथ्य है । उनमें अहंता की समस्या नहीं है । ये सिंहासन अपने लिए नहीं माँगती । वे चाहती हैं कि मेरा बेटा राजा बने । भरत मेरा बेटा है, भरत सिंहासन पर बैठे । यह ममता ही उनकी समस्या है ।
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