सभी युगवालों के लिए श्रीभरत जी में प्रेरणा है ; सतयुग वालों के लिए प्रेरणा इसलिए है कि भरत महान योगी हैं, साधक हैं, त्रेतायुग वालों के लिए इसलिए है कि उनके चरित्र में लोकोपकार और सेवा रूपी सर्वश्रेष्ठ यज्ञ भावना है ; द्वापर के लोगों के लिए वे इसलिए प्रेरक हैं कि उनके जैसा पूजा करने वाला भी कोई नहीं है - ह्रदय में असीम प्रेम के लिए वे नित्यप्रति प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं । लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं कि सबसे अधिक प्रेरक तो श्रीभरत कलियुग के लिए हैं, क्योंकि हमारे युग की समस्याओं का जो समाधान श्रीभरत ने दिया है वह अन्य किसी ने नहीं दिया । वे सावधान कर देते हैं कि आप लोग इसे पुराने युग की गाथा के रूप में न लीजिएगा । 'कलिकाल' का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं - इस कठिन कलियुग में मुझ जैसे दुष्ट को भगवान राम के सम्मुख श्रीभरत ही ले गए । किसी ने पूछ दिया - तो श्रीभरत आपको कैसे ले गए ? उन्होंने कहा - और सब लोगों को देखकर तो मुझे साहस नहीं हुआ कि मैं भी श्रीराम के सामने जाऊँ । जिनमें ज्ञान-भक्ति की उत्कृष्टता थी, उनके साथ जाने में डर लगा, क्योकिं उनके साथ जाने योग्य कोई भी लक्षण मुझमें नहीं है । श्रीभरतजी के साथ जाने वालों में मैंने जब गुरु वसिष्ठ को देखा, बड़े-बड़े ऋषियों को देखा, योग्य मन्त्री और सेनापतियों को देखा, सत्कर्म करने वालों को देखा, तो मुझे साहस नहीं हुआ । लेकिन जब देखा कि वे मन्थरा और कैकेयी को भी साथ लेकर चल रहे हैं तो सोचा कि मैं भी चल सकता हूँ ।
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