Thursday, 27 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

सेवा सबसे उत्तम वस्तु है, लेकिन मान लीजिए कोई संक्रामक रोग से ग्रस्त है और भाषण में सेवा की महिमा सुनकर उसके मन में उत्साह उमड़ पड़े कि वह तो लोगों की सेवा करेंगे, तो इसका परिणाम क्या होगा ? उससे पूछा गया कि क्या सेवा करोगे ? बोले, हम प्यासों को जल पिलाएँगे । जल पिलाना, तृप्ति देना एक बहुत बड़ी सेवा है, पर जब तपेदिक का रोगी कोई व्यक्ति प्यासों को जल पिलाएगा तो प्यासे लोग पानी तो वहाँ पी लेंगे, परन्तु यह क्या सच्चे अर्थों में सेवा है ? आपात दृष्टि से तो लगेगा कि जल पिलाने से प्यासे व्यक्ति की प्यास मिट गई, पर जब वह जल पिलाएगा, तो जल के साथ-साथ वह अपना रोगाणु भी तो पिलाएगा । और तब इसका परिणाम क्या होगा ? कुछ दिनों बाद बेचारे जिन लोगों ने उसके हाथ से जल पिया है, वे रोगी हो जाएँगे । यह कर्म तो सेवा के समान दिखाई देते हुए भी सेवा नहीं कुछ और है । अनर्थकारी है । भरतजी का अभिप्राय यह है कि जो स्वयं रोगी है, सच्चे अर्थों में दूसरों की सेवा नहीं कर सकता । वे समाज से यही पूछते हैं - आप किससे सुख पाना चाहते हैं मुझसे ? फिर विनम्रतापूर्वक कहा - आप लोग भी अस्वस्थ हैं और मैं भी । श्रीभरत ने नाड़ी पकड़ कर रोग का निदान कर लिया और देखा कि सब रोगी हो रहे हैं । यहाँ तक कि गुरु वसिष्ठ, जो स्वयं वैद्य हैं, रोगी हो रहे हैं । वैद्य भी कभी-कभी रोगी हो जाया करते हैं । श्रीभरत कहते हैं कि अगर आप लोगों को तथा गुरुदेव वसिष्ठजी को मेरा राज्य स्वीकार कर लेना ही उचित प्रतीत हो रहा हो तो मैं यही समझता हूँ आप सभी मोहग्रस्त हैं । और तब उन्होंने उनकी चिकित्सा की । वे पूरे समाज को लेकर चित्रकूट जाते हैं ।

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