जब विभीषण का भगवान श्रीराम से साक्षात्कार हुआ तब ममता के सन्दर्भ में उन्होंने दो बातें कहीं - प्रभो, अभी तक तो मैं लंका में था और ममता की अँधेरी रात ही मेरे अन्तःकरण में विद्यमान थी । ममता की उस अँधेरी रात में मैं समझता तो यही था कि मैं देख रहा हूँ, पर वस्तुतः मैं वास्तविकता को देख नहीं पा रहा था । इसका अभिप्राय क्या है ? लंका में रावण के द्वारा जो कार्य हो रहे थे, वे तो सब मेरी आँखों के सामने ही हो रहे थे या यह कहना चाहिए कि रावण के सारे कार्य मुझे दिखाई दे रहे थे । पर रावण के कार्य अगर मुझे सचमुच सही अर्थों में दिखाई दे रहे होते तो क्या इतने दिनों तक मैं लंका में रह पाता ? इसका अर्थ तो यही है कि लंका में रहते हुए उस ममता की अँधेरी रात में राग की दृष्टि से देख रहा था । वह राग की दृष्टि थी । व्यक्ति जब राग की दृष्टि से देखता है तब उसे सत्य का साक्षात्कार नहीं होता, बल्कि उसकी प्रकृति उल्टी है । उल्लू रात्रि में तो देखता है, पर दिन में उसे कुछ भी दिखाई नहीं देता । जिस व्यक्ति को राग और द्वेष की दृष्टि से मोह के अँधेरी रात में ही दिखाई दे और ईश्वर का प्रकाश न दिखाई दे, तो इससे बढ़कर उसका दुर्भाग्य और क्या हो सकता है । पर विभीषणजी ने कहा कि उस ममता की अँधेरी रात्रि में अब आपके प्रताप का रवि मेरे अन्तःकरण में उदित हो गया है । इसका परिणाम यह हुआ कि अब मेरे अन्तःकरण में ममता की अँधेरी रात मिट गयी है और मैं आपके चरणों में आ सका हूँ ।
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