ममता को समाप्त करने की प्रक्रिया सबसे अधिक जटिल बताई गयी है । एक प्रसंग में दोषों की गणना करते हुए गोस्वामीजी बताते हैं कि कौन-सा दोष आ जाने पर व्यक्ति कैसा बन जाता है । जैसे कि मोह व्यक्ति को अंधा बना देता है और जब काम आता है - काम व्यक्ति को नचाता है, सभी मनुष्य नारियों के वश में हैं और मदारी के बन्दर की भाँति स्त्रियों के इशारों पर नाचते हैं । तृष्णा ने किसे मतवाला नहीं बनाया और क्रोध ने किसका ह्रदय नहीं जलाया ? संसार में ऐसा कौन ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, विद्वान और गुणी है, जिसकी लोभ ने विडम्बना न की हो । इसी क्रम में गोस्वामीजी ने ममता को बड़े भयावह रूप में देखा और इसके लिये शब्द भी बड़ा भयानक चुना । यह मानसिक दुर्बलताओं के साथ जुड़कर कितना भयंकर परिणाम उत्पन्न करती है, इसकी चर्चा करते हुए वे कहते हैं - संसार में ऐसा कौन व्यक्ति है जिसके जीवन में ममता आकर उसके यश को नष्ट न कर देती हो, उस पर कलंक न लगा देती हो । यह ममता व्यक्ति के जीवन को कलंकित कर देती है ।
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