हम कितने भी समृद्ध क्यों न हों, हमारा परिवार कितना भी बड़ा क्यों न हो, पर जब हम बीमार हो जाते हैं तो सब व्यर्थ प्रतीत होता है, दुखद प्रतीत होता है । ठीक इसी प्रकार जब व्यक्ति और समाज का मन अस्वस्थ हो जाता है तब न तो व्यक्ति सुखी रह पाता है और न समाज । मन का रोगी न तो स्वयं सुख, चैन और शान्ति से रह सकता है और न दूसरों को रहने देता है । आज समाज के चारों ओर जो अव्यवस्था और अशान्ति दिखाई दे रही है, यदि हम गहराई में उसके मूल में पैठकर देखें, तो यही कह सकते हैं कि समाज में मन के रोग इतने अधिक बढ़ गये हैं कि इसके परिणामस्वरूप समाज में चारों ओर विग्रह और अशान्ति दिखाई पड़ रही है । मन के इन रोगों को दूर करने के लिए मन की चिकित्सा करने की आवश्यकता है । भौतिक शरीर की सुरक्षा और स्वस्थता के लिए जैसे चिकित्सा की आवश्यकता है ; शासन की ओर से इसका प्रबन्ध है ; महापुरुषों, आश्रमों और सेवा-प्रतिष्ठानों द्वारा भी उस दिशा में प्रयास होते हैं । परन्तु शरीर की अपेक्षा मन की स्वस्थता अधिक आवश्यक है, उसके लिए भी चिकित्सालय की आवश्यकता है । लेकिन इस चिकित्सालय की व्यवस्था शासनतन्त्र की ओर से सम्भव नहीं है ; बल्कि यह तो संतों के द्वारा ही संभव है । इसका संकेत हमें मानस के अयोध्याकाण्ड में श्रीभरत के चरित्र के माध्यम से मिलता है ।
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