Wednesday, 12 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जिस समय कैकेयीजी ने भगवान राम को बुला कहा कि राम ! मैंने तुम्हारे पिता से दो वरदान माँगे हैं, क्या तुम उन वरदानों को पूरा कर सकोगे ? भगवान राम ने पूछा - माँ तुमने क्या वरदान माँगा है ? तो उन्होंने कहा - एक तो यह कि मेरा पुत्र भरत राजा हो और दूसरा यह कि तुम चौदह वर्ष के लिए वन जाओ । भगवान श्रीराघवेन्द्र ने कैकेयीजी के चरणों को पकड़ लिया और गदगद कण्ठ से बोले - 'सुनु जननी....' कैकेयीजी को जननी कहा । भगवान श्रीराम का अभिप्राय क्या था ? मानो वे कहना चाहते हैं कि माँ, अगले जन्म में क्यों ? लो, मैं तो अभी से तुम्हारा पुत्र बन गया । तुम मेरी जननी हो । भगवान राम कैकेयीजी को जननी कहकर सावधान करते हैं । उन्होंने उन्हें माँ कहकर नहीं, अपितु जननी कहकर पुकारा । साधारणतया लोग समझते हैं कि माँ और जननी पर्यायवाची शब्द हैं । पर पर्यायवाची शब्दों में भी भावनात्मक अर्थों में भेद रहता है । किसी भी महिला को जिसके प्रति आपके मन में आदरबुद्धि है, आप माँ कहकर पुकार सकते हैं, पर जननी सबको नहीं कह सकते । जननी तो वही है, जिसके गर्भ से हमारा जन्म होता है । भगवान राम ने कैकेयी से कहा कि तुम तो मेरी जननी हो और वे बार-बार कह रहे हैं - आदि में, मध्य में और अंत में भी बारम्बार कहते हैं - माँ ! मेरी जननी तुम हो । मैं तुम्हारा बेटा हूँ । पर कैकेयी तो ममता से ग्रस्त हैं, वे सोचती हैं कि राम इस तरह से बोलकर मुझे भुलावा दे रहे हैं । मुझे फुसलाना चाहते हैं कि किसी तरह से मैं अपने शब्दों को वापस ले लूँ । लेकिन भगवान राम का उद्देश्य क्या था ? वे तो कैकेयीजी के भ्रम को दूर करने की ही चेष्टा कर रहे थे । भगवान राम ने कहा कि तुम्हें जो यह जो भ्रम हो गया है कि तुम भरत की जननी हो, वह भरत के आने पर दूर हो जाएगा और तुम जान लोगी कि वास्तव में तुम भरत की जननी हो या मेरी ।

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