श्रीभरत त्रेतायुग में आए और उस युग के लोगों ने उनके प्रेम को देखा, उनकी जीवन की साधना और तपस्या को देखा । सुनने वाला अचानक गोस्वामीजी से पूछ बैठता है कि महाराज, ये बातें तो त्रेतायुग वालों के लिए थीं । उस युग में जो समस्याएँ थीं - जो दुख, दरिद्रता और दीनता थी, उनका उन्होंने समाधान दिया, परन्तु आज तो आप केवल उनकी कथा सुना रहे हैं, केवल अतीत का इतिहास सुना रहे हैं । तब अन्तिम पंक्ति में गोस्वामीजी मानो संकेत कर देना चाहते हैं - नहीं, नहीं मैं पुरातन युग की ही बात नहीं कह रहा हूँ, वह तो बिल्कुल वर्तमान से जुड़ा हुआ इसी युग का सत्य है । गोस्वामीजी अपना दृष्टांत देते हुए कहते हैं - मैं तो इस युग का व्यक्ति हूँ । मैं अस्वस्थ था । गोस्वामीजी के जीवन में कितनी तीव्र कामुकता थी, उसका कितना तीव्र आवेग था, इससे आप लोग परिचित हैं । पर अन्त में वे इस रोग से मुक्त हुए, स्वस्थ हुए । किस उपाय से ? आज के युग में इन मानस रोगों से पीड़ित व्यक्ति और समाज को स्वस्थ रहने का उपाय बता देते हैं । आने वाले दिनों में इस उपाय पर चर्चा करेंगे ।
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