Wednesday, 19 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में रामकथा के अन्त में मानस रोगों का वर्णन कुछ विचित्र-सा लगता है । इसलिए कि रामकथा में मधुरता है और रोग का दृश्य तो कोई आकर्षक नहीं होता । जब आप किसी चिकित्सालय में जाकर रोगियों को देखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से ही वहाँ का वातावरण आपके लिए कोई उत्साहजनक नहीं होता । पर इतना होते हुए भी अस्वस्थ होने पर चिकित्सालय जाना व्यक्ति की बाध्यता है । व्यक्ति अगर अस्वस्थ हो जाय तो स्वस्थता के लिए रोग-निदान और चिकित्सा की आवश्यकता होती है । ऐसी स्थिति में चिकित्सालय प्रिय भले ही न लगे, पर वह कल्याणकारी तो है ही । रामकथा के समान मधुरता मानस-रोग के प्रसंग में नहीं है, क्योकिं इसमें मन की अवस्थाओं का, सूक्ष्म वासनाओं का ही वर्णन है । यह इतना आवश्यक है कि गोस्वामीजी ने निःसंकोच भाव से रामकथा के बाद मनुष्य के मन के रोगों का वर्णन किया है, और तत्पश्चात उसकी चिकित्सा का वर्णन करके रामकथा का समापन किया है । और यही हमारे आपके जीवन का सत्य है ।

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