भगवान श्रीराम के वन गमन के बाद गुरु वसिष्ठ श्रीभरत से जब यह कहते हैं कि तुम अयोध्या का राज्य-संचालन करो, प्रजा की सेवा करो, माताओं की सेवा करो, समाज की सेवा करो, तो उनका यह प्रस्ताव बड़ा युक्तियुक्त प्रतीत होता है । और इतना ही नहीं, कभी तो ऐसा भी प्रतीत होता है कि अन्त में श्रीभरत को यही करना भी पड़ा । उन्होंने चौदह वर्ष तक राज्य चलाया । अब यह प्रश्न किया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में अयोध्या के सारे समाज को, इतने बड़े जनसमूह को लेकर चित्रकूट जाने की क्या आवश्यकता थी ? गुरु वसिष्ठ की आज्ञा मानकर वे प्रजा की सेवा करते और चौदह वर्ष पश्चात श्रीराम के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देते । लेकिन यहीं पर रामचरितमानस का जीवन-दर्शन निहित है । और यह जीवन-दर्शन विशेष रूप से इसी युग के संदर्भ में प्रासंगिक है। गोस्वामीजी तो एक बहुत बड़ी बात कहते हैं । अयोध्याकाण्ड के अन्त में उन्होंने कहा कि अगर श्रीभरत का जन्म न हुआ होता, तो संसार को कुछ बातों से वंचित रहना पड़ता । उनमें से एक-एक को गिनाते हुए वे कहते हैं - श्रीभरत का जन्म न हुआ होता तो श्रीराम के प्रेम की परिपूर्णता समाज के सामने न आ पाती । बड़े-बड़े तपस्वियों और मुनियों के लिए भी जो साधना कठिन है, उसे अपने जीवन में साकार करके कौन दिखाता । और अगली पंक्ति में वे और भी महत्व की बात कहते हैं कि समाज में जो दुख, पीड़ा, जलन और दरिद्रता है, उसे दूर करने में श्रीभरत को छोड़कर दूसरा कौन समर्थ है ।
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