लंका विजय के पश्चात जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे तो वे सबसे पहले कैकेयीजी के भवन में हो गए । प्रभु ने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं । इसलिए वे पहले उन्हीं के महल में गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया । फिर अपने महल को गए । रामराज्य बन गया लेकिन गोस्वामीजी गीतावली में एक बड़ी अद्भुत बात लिखते हैं कि कैकेयी जब तक जीवित रहीं तब तक भरतजी ने कभी भी उनको माँ कहकर नहीं पुकारा । पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है । कैकेयीजी ने श्रीराम को पा लिया । उन्होंने रामराज्य में सहयोग दिया । भगवान राम ने कैकेयीजी की प्रशंसा की है । श्रीलक्ष्मण तो कैकेयीजी के चरणों में बारम्बार प्रणाम करते हैं, पर श्रीभरत जैसे उदार सहृदय व्यक्ति जीवन भर अपनी माँ को माँ कहकर न पुकारें, यह सुनकर तो बड़ा विचित्र-सा लगता है । लेकिन श्रीभरत की भूमिका यहाँ पर एक वैद्य की भूमिका है । वे सजग हैं, जानते हैं कि कैकेयी का रोग क्या है और उसे पथ्य क्या देना है । ममता ही कैकेयी का रोग है । ममता दाद के समान है । दाद का गीलेपन से बड़ा सम्बन्ध है । व्यक्ति अगर दाद वाले अंग को बार-बार गीला करेगा, उसे ठीक से सुखाएगा नहीं तो वहाँ फिर से दाद हो जाने की सम्भावना बनी रहेगी । अभिप्राय यह है कि व्यवहार में शुष्कता (रुखापन) मिले तो ममता का गीलापन कम होगा और आर्द्रता (अपनापन) मिले तो गीलापन बढ़ेगा । यही ममता की प्रकृति है । श्रीभरत ने एक सद् वैद्य की भूमिका का पूरा निर्वाह किया ।
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