लंका से लौटकर भगवान श्रीराम ने कैकेयीजी से पूछा - माँ ! जाते समय मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हारा बेटा मैं हूँ, अब तुम्हें विश्वास हुआ कि नहीं ? गोस्वामीजी लिखते हैं - कैकेयीजी प्रसन्न हो गयीं । उनके मन में कोई दुख नहीं रह गया । कई लोग यह कहते हैं कि कैकेयीजी ने भगवान राम से कहा कि भरत से मुझे माँ कहला दो । जो लोग ऐसा कहते हैं वे कैकेयीजी के चरित्र का अनादर करते हैं, वे तो भगवान श्रीराम की भक्ति का भी अनादर करते हैं । जो यह कहते हैं कि कैकेयीजी ने श्रीराम से हठ किया - भरत एक बार मुझे माँ कहकर पुकार दे और साथ-साथ यह भी कह दिया जाता है कि श्रीराम ने भरतजी से कह दिया कि तुम कैकेयीजी को माँ कहकर पुकारो और भरतजी ने कह दिया कि मैं नहीं पुकारुँगा । न तो यह बात भरतजी की मर्यादा के अनुरूप है और न श्रीराम के ही अनुरुप है । बल्कि भगवान राम ने तो भरतजी से कह दिया कि भरत यह बहुत अच्छा हुआ । क्या ? सभी भाइयों में आपस में बँटवारा होता है । इस बँटवारे में एक बहुत बड़ा लाभ यह हुआ कि अभी तक कैकेयीजी के बेटे हम दोनों थे, लेकिन अब उनका नाता तुमसे टूट गया और उन पर पूरा अधिकार केवल मेरा है । अब वे केवल मेरी माँ हैं । मेरे और माँ के बीच अब तुम तीसरे तो नहीं बनोगे ? श्रीभरत ने कहा - नहीं प्रभो ! हम तो यही चाहते हैं कि उनके अन्तःकरण में इसी सत्य का साक्षात्कार होता रहे कि उनके पुत्र तो एकमात्र श्रीराम को छोड़कर अन्य कोई नहीं है और सचमुच यही ममत्वशून्य स्थिति है । उस ममता के द्वारा कैकेयीजी को कलंक लगा और उनकी ममता को मिटाने के लिए ही श्रीभरत ने उनसे इतना शुष्क व्यवहार किया, उनके कलंक का प्रक्षालन किया और अन्त में जब उनके जीवन से ममता मिट गई, तभी उनका कल्याण हुआ ।
No comments:
Post a Comment