भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजी से परशुरामजी का संवाद अहंता और ममता से त्याग का प्रसंग है । सचमुच परशुरामजी ने अपनी अहंता और ममता का त्याग करके दिखाया । उन्होंने भगवान राम और लक्ष्मण को अर्थात ज्ञान और वैराग्य को पहचान लिया और अपने जीवन में उसे स्वीकार किया । ज्ञान और और वैराग्य के प्रतिष्ठित होते ही उनकी अहंता और ममता दूर हो गयी और आगे चलकर उन्होंने ममता को यहाँ तक त्याग दिया कि टूटे हुए धनुष से ममता की तो बात ही क्या - अपने कन्धे पर जो भगवान विष्णु का धनुष था, उससे भी उन्होंने अपनी ममता हटा ली और उसे उतारकर भगवान राम से कहते हैं - उसे तो आपने खण्डित कर दिया, अब इसे खींच लीजिए । अहंता और ममता दोनों के विनष्ट हो जाने पर परशुरामजी सुखी और संतुष्ट हो गए । पराजय की वृत्ति का निवारण हो गया । इसका सीधा-सा तात्पर्य यह है कि हमारे जीवन में सुख और दुख दोनों का सम्बन्ध ममता से है ।
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