Sunday, 9 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

कैकेयीजी बड़ी यशस्विनी थीं । सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी के रूप में उनकी सुन्दरता की कीर्ति फैली हुई थी । वे जितनी सुन्दर थीं, उतनी ही ओजस्विनी और तेजोमयी थीं । महाराज दशरथ जब युद्ध में जाते थे तब अन्य रानियाँ उनके साथ नहीं जाती थीं, पर कैकेयीजी रणक्षेत्र में भी उनका साथ देने के लिए जाती थीं । पति के प्रति उनके मन में प्रगाढ़ अपनत्व दिखाई देता है । उनकी उदारता भी इतनी प्रसिद्ध थी कि सभी लोग यह कहा करते कि सौतिया डाह सभी में पाया जाता है, परन्तु कैकेयीजी इसकी अपवाद हैं । इस तरह कैकेयीजी स्वभाव, शील, शौर्य और सौन्दर्य के लिए तो यशस्विनी थीं, पर यह अनर्थ क्यों हुआ ? ममता के कारण । अगर उनके अन्तःकरण से यह एक चीज मिट गयी होती, तो इतना बड़ा अनर्थ न हुआ होता । वे ममता के संस्कार को नहीं मिटा पाई, इस बात को भूल नहीं पाईं कि भरत मेरा बेटा है । श्रीराम उन्हें माँ कहकर पुकारते हैं । वे अपनी माँ से भी अधिक सम्मान कैकेयी को देते हैं, पर इतना होते हुए भी कैकेयीजी सोचती हैं कि अभी तो राम मेरे नकली बेटे हैं, अगले जन्म में हों तो हों । और अगले जन्म में कब होंगे ? जब मेरे गर्भ से जन्म लेंगे तभी वे मेरे असली बेटे होंगे । यही कैकेयीजी असली की परिभाषा मानती थीं ।

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