Wednesday, 5 October 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भक्त कवि दादू का एक बड़ा मधुर वाक्य है । उन्होंने भगवान से कहा - महाराज ! 'तन भी तेरा' यह शरीर भी मेरा नहीं है । 'मन भी तेरा, तेरा पिण्ड परान' - तन, मन, प्राण, यह सब आपका ही है । तो भगवान ने कहा - यह तो तुम्हारी बड़ी उदारता है । अपने लिए कुछ तो रख लिया होता । तो दादूजी कहा - महाराज, मैं उदार बिल्कुल नहीं हूँ । अपने लिए भी एक बचा लिया है । उस एक को छोड़कर बाकी सब आपका है । दादू कहते हैं - जो कुछ भी मेरा था वह सब आपका है, परन्तु आप मेरे हैं बस यही ममत्व की सार्थकता है । यही है ईश्वर को अपनी ममता की डोर में बाँध लेना । अन्य जिन लोगों को हम ममता की डोर से बाँधना चाहते हैं, वे भागने की चेष्टा करते हैं, लेकिन ईश्वर तो इतने उदार हैं कि वे स्वयं बँध जाने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं । कहते हैं - उपाय मैं स्वयं बता रहा हूँ । तुम मुझे बाँध क्यों नहीं लेते ?

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