श्रीभरतजी चित्रकूट की यात्रा में कैकेयी को भी साथ लेकर चलते हैं । कैकेयी को साथ ले जाने का क्या तात्पर्य है ? सारी समस्याओं की सृष्टि तथा राम को जीवन से दूर करने की चेष्टा जिन्होंने की, रामाज्ञा में गोस्वामीजी ने उन्हें कलि का प्रतीक बताया, 'कलहरूप कलि कैकेयी' । और इसका अभिप्राय यह है कि कैकेयीजी तब भले ही त्रेतायुग में निवास कर रही हो, पर उस समय वे कलि के समस्त लक्षणों से आक्रांत थीं । और तब श्रीभरत क्या करते हैं ? वे सारे समाज को लेकर चित्रकूट जाते हैं और साथ ही साथ कैकेयी को भी ले जाते हैं । इसके पीछे श्रीभरत का उद्देश्य क्या है ? गुरु वशिष्ठ ने उनसे कहा कि तुम प्रजा की, समाज की सेवा करो । पर उन्होंने गुरु वसिष्ठ के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया । बात बड़ी मनोवैज्ञानिक और बुद्धिगम्य है । वर्तमान युग के सन्दर्भ में हम अपने व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में अनुभव करके देख सकते हैं । आज क्या समाज-सेवकों की कमी है ? क्या समाज की समस्याओं का समाधान करने वालों का अभाव है ? एक कवि ने एक कविता सुनाई, जिसका भावार्थ यह था, " अब बाग में इतने माली हो गये हैं कि फूलों के लिए जगह ही नहीं बची है ।" माली ही माली दिखाई दे रहे हैं, फूल कहीं दिखाई नहीं देते । इतने सेवक होते हुए भी, सेवकों की संख्या निरन्तर बढ़ते जाने पर भी समस्या क्यों बनी हुई है ? श्रीभरत ने इसी ओर ध्यान आकृष्ट किया । गुरु वसिष्ठ कहते हैं कि सबकी सेवा करो । पर श्रीभरत का तात्पर्य यह है कि सेवा करने वाले की भी कुछ योग्यता और कसौटी होना चाहिए ।
No comments:
Post a Comment