कैकेयीजी ने मन्थरा से यही कहा था कि मैं ब्रह्मा से प्रार्थना करती हूँ कि यदि मेरा अगला जन्म हो तो राम मेरे पुत्र हों । पर क्या कैकेयी का अगला जन्म हुआ ? न उनका अगला जन्म हुआ और न राम उनके पुत्र बने । इसका तात्पर्य क्या हुआ ? कैकेयीजी की इतनी पूजा और प्रार्थना का क्या हुआ ? वह सब कहाँ गया ? उनका फल क्यों नहीं मिला ? यहीं पर कैकेयीजी और भगवान श्रीराम में मतभेद है मतभेद है । कैकेयीजी कहती हैं कि मेरा अगला जन्म हो और राम मेरे पुत्र बनें । किन्तु भगवान राम कहते हैं कि माँ, यदि तुम्हारा अगला जन्म हो गया, तब तो मेरा ईश्वरत्व किसी काम नहीं आया । मेरे ईश्वरत्व में सबको संसार से मुक्ति मिल जाय और तुम्हें न मिले तो यह तो मेरे लिए कलंक की बात होगी और तुम जो यह कहती हो कि अगले जन्म में राम मेरा बेटा बने, तुम्हारा इतना स्नेह और मैं तुम्हें इतने दिनों तक प्रतीक्षा कराऊँ ? अगले जन्म में तुम्हारा बेटा बनूँ तो तुम्हारी पूजा की क्या सार्थकता रह जाएगी ? मुक्ति न मिले तो मेरी सार्थकता नहीं और तत्काल फल न मिले तो तुम्हारी पूजा की सार्थकता नहीं । भगवान राम यह चाहते हैं कि कैकेयीजी यह समझ लें कि मैं उनका ही पुत्र हूँ । पर कैकेयीजी यह समझ नहीं पा रहीं हैं । शरीर को केन्द्र मानकर विचार करने के कारण उन्होंने यह मान लिया है कि राम मेरा बेटा नहीं है । वह जो मुझे माँ कहकर पुकारता है, वह तो एक भाव का नाता है । उसका जन्म मेरे गर्भ से नहीं हुआ है । मेरे गर्भ से भरत का जन्म हुआ है, इसलिए भरत ही मेरा वास्तविक पुत्र है, राम नहीं । कैकेयी ने तो भगवान की बातों पर विश्वास नहीं किया, लेकिन श्रीभरत ने एक सद् वैद्य की भूमिका का निर्वाह करते हुए इसे सिद्ध करके दिखा दिया कि सचमुच उनके पुत्र तो श्रीराम ही हैं ।
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