गोस्वामीजी ने युगधर्म का वर्णन करते हुए कहा है कि जब हमारे अन्तःकरण में ध्यान-समाधि की इच्छा जाग्रत हो, अन्तर्मुखता उत्पन्न हो, तो उस समय समझ लेना चाहिए कि हम मन से सतयुग में निवास कर रहे हैं । जिस समय हमारे अन्तःकरण में लोकसेवा, परोपकार तथा यज्ञ की वृत्ति आवे तो समझ लेना चाहिए कि हम त्रेतायुग में हैं । और जिस समय हमारे अन्तःकरण में पूजा और भगवान की अराधना की वृत्ति उदित हो तो समझ लेना चाहिए कि हम मानसिक रूप से द्वापर युग में निवास कर रहे हैं । पर जब मन में दूसरों को कष्ट देने की वृत्ति आए तब ? जब दूसरों को संकट में देखकर हमें प्रसन्नता हो, जब हमारे अन्तःकरण में काम, क्रोध आदि की वृत्तियाँ आएँ तो उस समय समझ लेना चाहिए कि कलियुग में बैठे हुए हैं । फिर इस क्रम में विपर्यय भी होता है । जैसे ऋतुओं के क्रम में आप देखते हैं, शीत ऋतु में ठण्डक की प्रधानता है, ग्रीष्म में गर्मी की और वर्षा ऋतु में वर्षा की । लेकिन इसमें कभी-कभी विपर्यय भी होता है । कभी-कभी शीतऋतु में भी ठण्डक का अनुभव नहीं होता, गर्मी की अनुभूति होती है । उस समय ऋतु का नाम भले ही शीतऋतु हो पर अनुभूति दूसरे ऋतु की होती है । इसी प्रकार ग्रीष्मऋतु में गर्मी पड़ रही है, अचानक वर्षा हो गयी तो ठण्डक आ जाती है । और तब नाम उसका भले ही ग्रीष्मऋतु हो पर उस समय हम शीतलता का अनुभव करते हैं, वर्षा का अनुभव करते हैं, ग्रीष्म का अनुभव नहीं होता है । तो जैसे ऋतुओं के क्रम में विपर्यय होता है, उसी तरह युगों में भी विपर्यय होता है ।
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