Tuesday, 28 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

आप अपने नन्हे से बालक के समक्ष क्या बनेंगे, निष्काम कि सकाम ? आपकी छोटी बच्ची खिलौने के नकली बर्तन में अगर कल्पना का हलुआ बना कर ले आये और आपको देने लगे तो क्या आप यह कहेंगे कि नहीं-नहीं मुझे भूख नहीं है ? यदि आप बुद्धिमान पिता होंगे तो उससे यही कहेंगे कि मुझे बड़ी भूख लगी थी और तुमने तो इतना बढ़िया हलुआ खिलाया कि मेरा तो पेट पूरा भर गया । भगवान राम भी सुग्रीव से यही कहते हैं कि मित्र ! यह न समझना कि मैं बड़ा हूँ और तुम छोटे हो, अरे भई हम दोनों में अन्तर ही क्या है । इसलिए आओ अब हम दोनों समझौता कर लें । क्या समझौता ? बोले मित्र ! तुम्हारी पत्नी को हम मिला देंगे और हमारी पत्नी को तुम मिला देना । मैं तुम्हें राज्य दिला दूँगा, बाद भी मुझे भी राज्य मिल जायेगा । तो भगवान राम जो इतना नीचे उतरकर बोल रहे हैं, क्या सचमुच उन्हें नीचे उतरने की आवश्यकता है ? वस्तुतः इसका अभिप्राय है कि भगवान की विशेषता यही है कि ऊपर से ऊपर भी वही हैं और नीचे से नीचे भी वही हैं । प्रभु ऊपर उठे व्यक्तियों में किसी से ज्ञान की भाषा बोलते हैं, किसी से वैराग्य की भाषा बोलते हैं, किसी से धर्म की भाषा बोलते हैं और किसी से सकामता की भाषा बोलते हैं ।

Monday, 27 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान निष्कामता में हैं यह तो हर कोई देख लेता है, पर भगवान कितने सकाम बन गये यह आप सुग्रीव के प्रसंग में देख लीजिए । सुग्रीव से जो भाषा भगवान राम बोल रहे हैं वह सकामता वाली भाषा है या निष्कामता वाली ? इस प्रसंग में भगवान ने सकामता की भाषा में पूरा उपदेश दिया । और केवल उपदेश ही नहीं दिया अपितु प्रभु कहते हैं कि घबराओ नहीं, हमारी-तुम्हारी मित्रता बिल्कुल ठीक है । आपने यह देखा कि सुग्रीव से मित्रता भगवान ने कब की ? यद्यपि अयोध्या का राज्य छोड़कर भगवान वन में बहुत पहले आ गये थे पर सुग्रीव से मित्रता करने के लिए तब आये जब श्री सीता जी खो गयी । आपने ध्यान दिया, प्रभु इतने विलम्ब से क्यों आये ? प्रभु ने मानो कहा - सुग्रीव ! हमारी और तुम्हारी दशा बिल्कुल एक जैसी है । क्योंकि तुम्हारा राज्य भी गया हुआ है और मेरा राज्य भी गया हुआ है । तुम्हारी पत्नी भी खोयी हुई है और मेरी पत्नी का भी अपहरण हो चुका है । इसलिए हममें और तुममें कोई अन्तर नहीं है । प्रभु बड़े अनोखे हैं । वे जिससे मिलते हैं बस उसी तरह बन जाते हैं । यह बन जाना ही प्रभु की उदारता है और यही तत्व सर्वत्र विद्यमान है ।

Sunday, 26 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

हनुमान जी ने सुग्रीव से जब प्रभु की मित्रता करायी और सुग्रीव को प्रभु ने ह्रदय से लगाया तब सुग्रीव जी ने भगवान राम की ओर देखकर कहा कि प्रभु ! आप मेरे कर्तव्य का उपदेश मुझे दीजिए । आप बताइए कि मैं आपकी भक्ति कैसे करुँ, मैं आपको कैसे प्रसन्न करुँ ? उस समय भगवान राम ने जो उपदेश सुग्रीव जी को दिया उस पर यदि आपने ध्यान दिया हो तो आपको यह बड़ी विचित्र सी बात लगेगी कि वह शब्द तो प्रभु हनुमान जी से, लक्ष्मण जी अथवा भरत जी से कभी नहीं बोले जिस शब्द का प्रयोग प्रभु सुग्रीव से करते हैं । भगवान ने कहा - सुग्रीव ! तुम तो मेरे मित्र हो इसलिए मैं चाहूँगा कि मित्र का जो धर्म है तुम उसका अपने जीवन में पालन करो । सुग्रीव ने पूछा - महाराज ! मित्र का धर्म क्या है ? तो भगवान ने पहला वाक्य यही कहा कि - मित्र सुग्रीव ! मित्र का कर्तव्य है कि न तो देने में संकोच करे और न ही लेने में । और भाई ! ये लेन-देन की चर्चा रामायण में भगवान ने अगर किसी से की तो केवल सुग्रीव से । अगर कोई प्रभु से पूछ दे कि महाराज ! लोग तो कहते हैं कि देना बहुत अच्छा है और लेना बुरा । तो भगवान कहते हैं - बिल्कुल नहीं, दोनों बहुत अच्छे हैं । क्योंकि जो देने में संकोच करता है वह कृपण है और जो लेने में संकोच करता है वह अभिमानी है । सोचता है कि हम ले लेंगे तो छोटे मान लिये जायेंगे । प्रभु ने कहा - भाई ! हमारा-तुम्हारा तो मित्रता का बराबरी का नाता है इसलिए मैं जो दूँ उसे तुम लो और तुम जो दोगे मैं लूँगा ।

Saturday, 25 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

कबन्ध एक विद्वेषी व्यक्ति था पर ऐसा नहीं कि भगवान उसका हित नहीं करते हैं । प्रभु तो उसका भी कल्याण करते हैं, पर कल्याण करने में अन्तर है । कबन्ध के ऊपर भगवान बाण का प्रयोग करते हैं । प्रभु जब देखते हैं कि यहाँ मीठी दवा से लाभ होने वाला नहीं है तो पहले कड़वी दवा का प्रयोग करते हैं और उसके पश्चात कबन्ध के अन्तःकरण का जो विद्वेष है उसे मिटाने के लिए ब्राह्मण की महिमा प्रतिपादित कर देते हैं । परन्तु शबरी जी के संबंध में प्रभु जानते हैं कि यह जात्याभिमान से शून्य परम भक्तिमति हैं, इसलिए भगवान राम वहाँ पर भक्ति की महिमा का गायन करते हैं । और इसी तरह हनुमान जी से भगवान राम का जो वार्तालाप हुआ उस पर भी आप जरा ध्यान दीजिए । फिर सुग्रीव से मिलन के पश्चात सुग्रीव को भगवान राम ने जो उपदेश दिया उस पर यदि विचार करेंगे तो आपको वहाँ पर भी यही दिखायी देगा कि उन दोनों पात्रों को दिये गये उपदेश एक-दूसरे से भिन्न हैं ।

Friday, 24 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बड़े-बड़े महात्माओं के समक्ष भगवान राम ने जिज्ञासा प्रकट की । महर्षि भरद्वाज, महर्षि वाल्मीकि तथा महर्षि अगस्त्य सबके सामने भगवान राम ने अपना प्रश्न रखा । लेकिन जब श्रीसीता जी खो गयीं तो भगवान श्रीराम ने शबरी जी से ही कहा कि - शबरी जी ! जनकनन्दिनी श्रीसीता जी खो गयी हैं, आप बताइए कि सीता पुनः कैसे मिलेंगी । भगवान का अभिप्राय था कि ऐसा पात्र मेरी दृष्टि में शबरी से बढ़कर कोई नहीं है जो सीता जी की प्राप्ति का मार्ग बता सके । इस प्रकार साधारण सी एक नारी और शूद्र दिखायी देने वाले पात्र से भगवान श्रीराम ने सीता को प्राप्त करने का उपाय पूछा । और जो आदेश शबरी जी ने दिया भगवान श्रीराघवेन्द्र ने उसी का पालन किया । भगवान श्रीराम उनकी आज्ञा मानकर पम्पासर की ओर यात्रा करते हैं । इसका अभिप्राय है कि भगवान श्रीराम, सामने वाले व्यक्ति की अवस्थिति को देख लेते हैं और उसी के अनुरूप उससे वार्तालाप करते हैं । कबन्ध अभिमानी है तो उसको दूसरे प्रकार का उपदेश देते हैं । और शबरी जी में भक्ति तथा विनम्रता की पराकाष्ठा है, इसलिए प्रारम्भ में भगवान ने शबरी जी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया ।

Thursday, 23 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ब्राह्मण की पूज्यता की बात भगवान राम ने कबन्ध के अन्दर की जो द्वेष बुद्धि है, उसको मिटाने के लिए कहते हैं । प्रथम दृष्टि में पढ़ कर लगता है कि भगवान राम ब्राह्मणों के प्रबल समर्थक हैं और शायद शूद्रों के विरोधी हैं, पर इस उपदेश के तुरंत बाद भगवान राम ने जो व्यवहार किया उसने सिद्ध कर दिया कि नहीं, नहीं - बात तो इससे उल्टी है । क्योंकि कबन्ध को गति देने के बाद सबसे पहले भगवान किसके पास गये ? - भगवान सीधे शबरी जी के पास गये । और शबरी जी कौन हैं इस पर आपने विचार किया ? गोस्वामीजी के बारे में यह बात बड़ी प्रसिद्ध है कि वे स्त्रियों तथा शूद्रों के बड़े विरोधी थे । और अक्सर लोग यह चौपाई दुहरा देते हैं कि -
ढोल गवाँर शूद्र पसु नारी ।
सकल ताड़ना के अधिकारी ।।
- और सचमुच इसको पढ़कर तो यही लगता है कि वे स्त्री तथा शुद्र दोनों के विरोधी थे । किन्तु इस प्रसंग को अगर आप ध्यान से पढ़ें तो आपको यह अच्छी तरह पता चल जायेगा कि संयोग से शबरीजी स्त्री और शूद्र दोनों ही है । और शबरी जी से जब भगवान राम का वार्तालाप हुआ तो उन्होंने यही कहा कि महाराज ! मैं स्त्री हूँ और स्त्री में भी छोटी जाति की हूँ । पर भगवान ने उनसे स्पष्ट कह दिया कि इससे मुझको क्या लेना-देना है, क्योंकि मैं तो जाति-पाँति को मानता ही नहीं हूँ । - तो भई ! आप इसको क्यों नहीं पढ़ते, आप कबन्ध बनकर ही क्यों पढ़ना चाहते हैं ? कबन्ध तो अत्यंत द्वेषयुक्त ह्रदय वाला है । शबरी के लिए भगवान के मन में अत्यधिक श्रद्धा है । नारी और शूद्र के रूप में दिखायी देने वाली शबरी को भगवान ने जितना सम्मान दिया उतना सम्मान तो रामायण में ब्राह्मण वर्ण के किसी महात्मा को भी नहीं दिया ।

Wednesday, 22 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

कबन्ध ने जब बड़े चतुराई भरे शब्दों में भगवान से कहा - महाराज ! दुर्वासा तो इतने बड़े क्रोधी हैं कि उन्होंने मुझे शाप दे दिया और आप इतने सज्जन हैं कि आपने मुझे सद्गति दे दी । कबन्ध मानो यह कहना चाहता था कि दुर्वासा ब्राह्मण होकर भी बड़े क्रोधी हैं । कबन्ध की दृष्टि में दोष दर्शन है । परन्तु भगवान श्रीराघवेन्द्र ने तुरन्त उसको फटकारते हुए कहा कि अरे कबन्ध ! ब्राह्मण चाहे फटकारे, चाहे शाप दे, चाहे कैसे भी बोले, पर वह पूज्य है । अब आजकल लोग पढ़ते हैं तो कहते हैं कि ब्राह्मणवाद का इतना समर्थन ? पर उस वाक्य के पीछे भगवान राम का अभिप्राय मानो यह था कि दुर्वासा के अवगुण तो तू देख रहा है, पर दुर्वासा के जीवन में जो तप है, त्याग है, गुण है, जो विशेषताएँ हैं उन पर तेरी दृष्टि नहीं जा रही है । भले ही उनमें क्रोध की मात्रा कुछ अधिक है पर शाप के पीछे तुम्हारी अमर्यादा ही तो मुख्य कारण है । कबन्ध का जो वर्णन किया गया है उसमें बड़ी सांकेतिक भाषा निहित है । कहा जाता है कि कबन्ध के शरीर में सिर के नीचे वाला सब भाग था, केवल सिर नहीं था । इसका अभिप्राय है कि यद्यपि संसार में यह जो शरीर की रचना हुई है उसके अनुसार एक व्यक्ति के शरीर में सिर भी चाहिए, ह्रदय भी चाहिए, भुजा भी चाहिए और चरण भी चाहिए तथा चारों में ही स्वस्थता भी होनी चाहिए । पर अगर कोई व्यक्ति ऐसा मिल जाय जो कहे कि मैं तीन से ही काम चलाऊँगा, चौथा नहीं चाहिए तो इसका अर्थ है कि उसके अन्तःकरण में उस चतुर्थ अंग के प्रति विद्वेष भरा हुआ है । चतुर्वर्ण के अनुसार सिर ब्राह्मण का प्रतीक है । पर कबन्ध के शरीर में सिर नहीं था । इसका अभिप्राय है कि ब्राह्मण के प्रति उसके अन्तःकरण में अत्यंत विद्वेष बुद्धि भरी हुई थी । इसलिए भगवान राम बाँटकर कहते हैं - नहीं, नहीं ब्राह्मण तो हर तरह से पूज्य है । ब्राह्मण की पूज्यता की बात भगवान उसके अन्दर की जो द्वेष बुद्धि है, द्वेष वृत्ति है, उसको मिटाने के लिए कहते हैं ।

Tuesday, 21 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

अहिल्या को महर्षि गौतम ने शाप दिया और कबन्ध को दुर्वासा ने शाप दिया । पर दोनों की दृष्टि में आपको भिन्नता दिखाई देगी । अहिल्या जब भगवान के चरणों के स्पर्श से चेतन हुई तो कह सकती थी कि महाराज ! आप बड़े सज्जन हैं, मेरे पति तो बड़े क्रोधी हैं । क्योंकि एक छोटे से अपराध पर उन्होंने मुझे इतना बड़ा शाप दे दिया । अगर ऐसी बात अहिल्या कहती तो गौतम के व्यवहार की दृष्टि से कोई अटपटी बात नहीं होती । लेकिन अहिल्या की दृष्टि कितनी सुन्दर है । अहिल्या को उस समय महर्षि गौतम की याद आयी और तुरंत उसने भगवान राम के चरणों में प्रणाम करके कहा - प्रभु ! मैं आपकी कृतज्ञ हूँ ही लेकिन अपने पतिदेव की और भी अधिक कृतज्ञ हूँ । क्योंकि - महाराज ! वरदान का लक्ष्य अन्त में भगवान की प्राप्ति ही तो है । तो जो ईश्वर, वरदान से मिलता है अगर शाप से मिल जाए, तब तो वरदान की अपेक्षा शाप ही अच्छा है । मेरे पतिदेव ने बड़ी कृपा की जो मुझे शाप दे दिया । और जब भगवान राम अहिल्या की इस प्रकार की वाणी सुनते हैं तो समझ लेते हैं कि इसकी दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं है बल्कि गुण दर्शन पर है ।

Monday, 20 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान ने जब कबन्ध को गति दी तो वह लगा भगवान की प्रशंसा करने । यद्यपि प्रशंसा करना तो अच्छी बात है, पर अगर सद्भाव से हो तो । लेकिन कई लोग जब एक की प्रशंसा करेंगे तो दूसरे की निन्दा यह कहकर अवश्य करेंगे कि आप तो बड़े सज्जन हैं पर वह तो बड़ा बुरा है । इसका अभिप्राय है कि वह यह समझता है कि इनकी प्रशंसा के साथ-साथ हम जब दूसरे की निन्दा करेंगे तो इनकी प्रसन्नता और अधिक बढ़ जायेगी । और कुछ लोगों की प्रसन्नता दूसरों की तुलना में प्रशंसा सुनकर सचमुच बढ़ भी जाती है । कबन्ध ने यदि केवल भगवान राम की प्रशंसा ही की होती कि आप बड़े उदार हैं तब तो वह सर्वथा उचित प्रशंसा थी । पर कबन्ध ने बड़ी चतुराई भरे शब्दों में भगवान से कहा कि - महाराज ! दुर्वासा तो इतने बड़े क्रोधी हैं कि इन्होंने मुझे शाप दे दिया और आप इतने सज्जन हैं कि आपने मुझे सद्गति दे दी । और जब भगवान राम ने कबन्ध का यह शब्द सुना तो तुरन्त भगवान राम समझ गये कि यह कहाँ अटका हुआ है । और इसके मन में जो संस्कार है उसको यहाँ से हटाना चाहिए । इसलिए उसकी स्थिति को समझकर भगवान ने जो वाक्य कहा वह केवल कबन्ध के लिए है । हाँ ! अगर आप में से कोई कबन्ध हो तो उसे सही ही माने । लेकिन अगर आप कबन्ध नहीं हैं तो आपको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है ।

Sunday, 19 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

आजकल यद्यपि जातिवाद की आलोचना तो खूब है पर लोगों में जातिवाद भी बहुत है । इसलिए आजकल वह चौपाई तो बड़ी प्रसिद्ध और चर्चित है जो गोस्वामीजी ने भगवान राम तथा कबन्ध के मिलन के सन्दर्भ में लिखी है । इस सम्बंध में मैं आपको यह बताना चाहूँगा कि कबन्ध को भगवान राम ने जो उपदेश दिया, जो व्यक्ति केवल वही पढ़ेगा वह उलझ जायेगा । पर अगर व्यक्ति इस बात पर भी ध्यान देगा कि जिन भगवान राम ने कबन्ध को उपदेश दिया उन्हीं भगवान राम ने शबरी को भी उपदेश दिया । और दोनों को दिये गये उपदेश को सामने रखकर जब आप विचार करेंगे तो समझ लेंगे कि दोनों उपदेशों में भिन्नता के पीछे भगवान राम का उद्देश्य क्या है ? भगवान श्रीराम जानते हैं कि सबकी स्थिति अलग-अलग होती है । कबन्ध की स्थिति क्या है तथा शबरी की स्थिति क्या है, इसे भगवान श्रीराघवेन्द्र भलीभाँति जानते हैं, इसलिए दोनों सन्दर्भों में प्रभु का उपदेश इतना बदला हुआ है ।

Saturday, 18 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामचरितमानस में बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं जिसमें अलग-अलग पात्रों को भगवान राम अलग-अलग उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं । उन उपदेशों को अगर आप ध्यान से पढ़ेंगे तो उन उपदेशों में परस्पर एकता नहीं अपितु भिन्नता परिलक्षित होगी । उस भिन्नता को जो समझ नहीं पाते उन्हें उन वाक्यों को पढ़कर बड़ी विचित्र सी अनुभूति होती है । उनके मन में बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया होती है । लेकिन जो पूरे रामचरितमानस को व्यापक दृष्टि से पढ़ेगा, वह केवल भगवान के वाक्यों को नहीं देखेगा वरन भगवान ने उन वाक्यों को किसके लिए कहा है, किन संदर्भों में कहा है, यदि इस पर ध्यान देगा तो उसके मन में कोई उद्वेग नहीं होगा । आज का युग थोड़ा "संवेदनशील" हो गया है । लोगों में कई चेतनाएँ ऐसी प्रबल हो गयी हैं कि अगर एक पंक्ति भी कभी उनको ऐसी मिले तो उनको चोट पहुँचती है । उन्हें लगता है कि रामायण का यह वाक्य है ? रामायण का यह सिध्दांत है ? पर मैं यही कहूँगा कि आप भगवान श्रीराघवेन्द्र के वाक्य को उस सन्दर्भ में देखिए जिस सन्दर्भ में वे अलग-अलग पात्रों को वह वाक्य कह रहे हैं ।

Friday, 17 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

पहले हम यह निर्णय कर लें कि हम कहाँ हैं ? और कहाँ होने का निर्णय सन्त के द्वारा होने के पश्चात निर्णय करें कि अगर हम कहाँ हैं तो फिर हमारे कर्तव्य का स्वरूप क्या है ? हमारी साधना का स्वरूप क्या है ? और जब व्यक्ति उसी केन्द्र के आधार पर अपनी साधना और कर्तव्य का निर्णय करने का प्रयास करेगा, तब वह लक्ष्य तक पहुँच जायेगा । उसको अपने चरम उद्देश्य की उपलब्धि हो जायेगी । पर अगर व्यक्ति अपने बारे में यह निर्णय नहीं कर पावेगा कि मेरा मूल स्थान कौन सा है, मेरा वास्तविक परिचय क्या है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जैसे अपना घर यदि न हो तो व्यक्ति चारों ओर भटकता रहता है । इसी प्रकार व्यक्ति के  जीवन में भी केवल भटकाव की स्थिति बनी रहेगी । इसीलिए हम अपने केन्द्र को पहचानने की चेष्टा करें ।

Thursday, 16 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

हम लोग व्यवहार में नित्य यह देखते हैं कि दिन भर हम लोग संसार में कभी यहाँ तो कभी वहाँ, चक्कर ही तो काटते रहते हैं । परन्तु यहाँ, वहाँ चले जाने के बाद भी व्यक्ति का अपना एक निजी घर होता है जहाँ चारों ओर से चक्कर काटने के पश्चात लौटकर व्यक्ति अवस्थित होता है । इसी तरह से हमारे और आपके जीवन में चारों ओर भटकाव होने पर भी यदि कोई न कोई ऐसा केन्द्र हो, ऐसा महापुरुष हो कि जिस पर हमारा विश्वास हो और अगर उसी केन्द्र को हम ठीक-ठीक समझकर उस महापुरुष के द्वारा ही यदि हम अपने जीवनपथ का निर्धारण करें तो हमारे जीवन में आने वाली समस्याओं का निराकरण हो जायेगा ।

Wednesday, 15 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

कभी हम और आप शरीर में स्थित होते हैं, कभी मन में स्थित हो जाते हैं । कहीं-कहीं यह दृश्य मुझे दिखायी देता है कि श्रोता कथा में आया हुआ है पर अचानक वह नींद लेने लगता है । इसका अर्थ है कि उस समय वह शरीर में चला गया । क्योंकि अगर मन से बैठा हुआ होता तो उसे नींद नहीं आती । जब मन नहीं लगता है तो शरीर का जो तमोगुण है वह इस पर अधिकार कर लेता है । इसका अभिप्राय है कि हम कभी शरीर में स्थित होते हैं और कभी मन के रस में डूब जाते हैं । बुद्धि से विचार करने की प्रवृत्ति भी कई व्यक्तियों के जीवन में उदित होती है । कई व्यक्तियों में तीव्रतम अहंकार का उदय होता हुआ भी दिखाई देता है । फिर ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति के लिए क्या यह निर्णय करना सरल है कि वस्तुतः मेरा परिचय क्या है ? भगवान श्रीराघवेन्द्र तथा महर्षि भरद्वाज के संदर्भ से इसका जो उत्तर दिया गया है उस पर हमें विचार करना चाहिए ।

Tuesday, 14 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराम जब वन जाने के लिए कौसल्या के पास आये, और कौसल्या अम्बा को जब यह पता चला कि श्रीराघवेन्द्र वन जाने की आज्ञा लेने के लिए मेरे पास आये हैं तो कौसल्या अम्बा ने कहा - राघवेंद्र ! अगर तुम्हारे पिता ने वन जाने की आज्ञा दी है तो मैं आज्ञा देती हूँ कि वन मत जाओ ! वहाँ पर कौसल्या अम्बा का वाक्य यही था - जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ।। - तुम्हें माँ को बड़ा समझकर वन नहीं जाना चाहिए, क्योंकि पिता की तुलना में माँ की आज्ञा का पालन श्रेष्ठ है । परन्तु आगे माँ ने मातृत्व की इतनी सुन्दर व्याख्या की कि जिससे प्रभु के समक्ष किसी प्रकार का धर्म संकट नहीं आया । माँ ने कह दिया - पुत्र ! अगर पिता दशरथ के साथ-साथ तुम्हारी माँ कैकेयी ने भी वन जाने के लिए कहा हो तो तुम जरुर जाओ । प्रभु बड़े प्रसन्न हो गये कि चलो माँ ने ऐसा सूत्र दिया कि जिससे मेरी समस्या टल गयी । लेकिन इस पंक्ति के आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि पिता की अपेक्षा माँ बड़ी है ।
      पिता की श्रेष्ठता सिध्द करने वाली पंक्ति भी आपको रामचरितमानस में प्राप्त हो जायेगी । श्रीभरत जब ननिहाल से लौटकर आते हैं उस समय जब गुरु वसिष्ठ उन्हें समझाने लगते हैं तो यही कहते हैं कि पिता की आज्ञा सर्वोपरि है और वे दृष्टांत भी दे देते हैं कि पिता का पद तो इतना महत्वपूर्ण है कि परशुराम जी को पिता ने आज्ञा दी तो उन्होंने अपनी माँ का वध कर दिया । अगर परशुराम ऐसा कर सकते थे तो तुम्हें तो राज्य लेने की बात को पिता की आज्ञा के रूप में स्वीकार कर ही लेना चाहिए । तो भई ! कर्तव्यों तथा मान्यताओं के टकराहट के रूप में इस प्रकार का अन्तर्द्वन्द हमारे और आपके जीवन में आता है । श्री रामचरितमानस के आश्रय से हम इसका समाधान प्राप्त कर सकते हैं ।

Monday, 13 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

व्यावहारिक संदर्भ में संबंधों की विभिन्नता को लेकर कभी-कभी कठिनाई उत्पन्न हो जाती है । जैसे शास्त्र का एक आदेश है कि माँ की आज्ञा माननी चाहिए । यद्यपि यह बात तो बड़ी सीधी सी लग रही है । अगर माता-पिता दोनों की आज्ञा एक हो तब तो निश्चय करना बड़ा सरल हो जाता है कि माता-पिता की आज्ञा माननी चाहिए । पर अगर माता और पिता दोनों की आज्ञा में टकराहट हो जाय तो फिर व्यक्ति दोनों में से किसकी आज्ञा को माने ? अब यदि शास्त्रों को ढूँढ़िये तो उसमें परस्पर इतने विरोधी वचन मिलते हैं कि जो एकाध श्लोक पढ़ लेते हैं वे भ्रम में पड़ जाते हैं । क्योंकि शास्त्र में जहाँ पिता के महत्व का वर्णन किया गया है, वहाँ यदि यह कहा गया है कि पिता का स्थान सर्वोच्च है, तो जहाँ माता की महिमा का वर्णन किया गया है वहाँ माँ को शीर्ष पद दिया गया है । श्रीरामचरितमानस में दोनों ही प्रकार के दृष्टांत आपको मिलेंगे ।

Sunday, 12 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

विनय-पत्रिका में गोस्वामीजी तथा भगवान राम का बड़ा अनोखा संवाद हुआ । गोस्वामीजी भगवान से कहने लगे कि आप से मैं संबंध जोड़ना चाहता हूँ । प्रभु ने जानना चाहा कौन सा संबंध जोड़ना चाहते हो ? तो गिनाने लगे - आप ब्रह्म हैं मैं जीव हूँ, आप स्वामी हैं मैं सेवक हूँ, आप पिता हैं मैं पुत्र हूँ, आप माँ हैं मैं बेटा हूँ, आप मेरे मित्र हैं मैं आपका मित्र हूँ । जब इतना गिना दिया तो गोस्वामीजी से भगवान ने मुस्कराकर पूछा - यह तो तुमने बड़ी सूची प्रस्तुत कर दी । किन्तु यह तो बताओ तुम हमारे और अपने बीच में इनमें से किस नाते को मानना चाहते हो ? तब गोस्वामीजी ने बड़ी चतुराई से अपनी बात भगवान के सामने कह दी - प्रभु ! आपको जो अच्छा लगे उसे आप मान लीजिए । भगवान ने कहा - बड़ी अनोखी बात है, अरे ! नाता जोड़ने के लिए तो तुम आये हो कह रहे हो कि आपको जो अच्छा लगे वह मान लीजिए । गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! मेरे सामने दो समस्याएँ हैं । पहली तो यह कि आपके और मेरे बीच जब इतने नाते हैं तो मैं यह निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि आपसे सबसे अधिक लाभ किस नाते से लिया जा सकता है । और दूसरे प्रभु ! मैं चाहता हूँ कि नाता तो मैंने गिना दिये लेकिन चुनाव आप ही करें । प्रभु ने कहा - क्यों ? गोस्वामीजी ने कहा - प्रभु ! यदि मैं आपसे कहूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ तो आप मुझे यही कह देंगे कि तुम पुत्र के कर्तव्य का पालन करो । यदि कहूँगा कि मैं मित्र हूँ तो आप कहेंगे कि मित्र के धर्म का पालन करो । और अगर मैं कहूँ कि आप गुरु हैं, तो आप कहेंगे कि शिष्य के धर्म का पालन करो । तो महाराज ! मुझे बड़ी चिन्ता यह हो गयी है कि मैं इन धर्मों का पालन कर पाऊँगा या नहीं । और आप यदि कह देंगे कि मैं तुम्हारा पिता हूँ तो मेरे ऊपर कुछ भार नहीं है । आप पिता हैं तो आप पिता के धर्म का पालन कीजिए । ऐसी स्थिति में चुनाव का भार मैं आप पर ही छोड़ देता हूँ कि इन नातों में से आप ही बता दीजिए कि आपको कौन सा नाता प्रिय लग रहा है । सांकेतिक दृष्टि से यदि कहें तो इसका अभिप्राय है कि साधना के सन्दर्भ में व्यक्ति के लिए कभी-कभी यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि ईश्वर को हम किस रूप में देखें, ईश्वर से किस संबंध का निर्वाह करें ?

Saturday, 11 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

.....कल से आगे.....
समस्या यह है कि व्यक्ति अपने लिए किस मार्ग का चुनाव करें ? क्योंकि अगर सभी रूपों में सामंजस्य हो तब तो कठिनाई नहीं । लेकिन दिखायी यह देता है कि कभी-कभी देश के स्वार्थ में टकराहट होती है । कभी धर्म में विभिन्नता दिखायी देती है, और कभी वर्ण में भिन्नता परिलक्षित होती है । तो फिर ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति अगर अपने विषय में यह निर्णय करने चले कि वस्तुतः मैं कौन हूँ, तो इसका क्या उपाय है ? वेदान्तियों ने तो व्यक्ति का एक अलग ही परिचय दिया । उन्होंने कहा - जीव साक्षात ब्रह्म है । अब जीव साक्षात ब्रह्म है, जीव मनुष्य है, जीव भारतवासी है, जीव हिन्दु है या जीव ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र है ? और फिर ब्राह्मण भी अनेक रुपों में बँटा हुआ है । इस प्रकार सचमुच व्यक्ति के सामने यह बहुत बड़ी समस्या आ जाती है कि वह इनमें से केन्द्र किसको बनाये ? स्वयं अपने लिए कर्तव्य तथा मार्ग का निर्णय हम करें तो किस आधार को केन्द्र बनाकर करें ? रामचरितमानस के विभिन्न चरित्र के माध्यम से हम आने वाले दिनों में इसका समाधान प्राप्त करेंगे ।

Friday, 10 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

मार्ग के सन्दर्भ में यह बात कही गयी थी कि जो व्यक्ति जहाँ पर है, वहीं से उसकी यात्रा प्रारंभ होती है । वैसे स्थूल जगत में तो यह निर्णय करना कठिन नहीं है कि कौन व्यक्ति किस नगर में रहता है, पर क्या आन्तरिक जीवन में भी इतनी ही सरलता से यह निर्णय हो सकता है कि कौन सा व्यक्ति किस नगर का निवासी है ? अगर इस दृष्टि से विचार करके देखें, तो व्यक्ति के आन्तरिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या यही है कि सही अर्थों में वह स्वयं ही नहीं समझ पाता कि मैं कहाँ हूँ ? अगर व्यक्ति के परिचय के सन्दर्भ में प्रश्न किया जाय तो हमें उसके परिचय में भी विविधता मिलेगी । एक ही व्यक्ति के परिचय के संबंध में अगर पूछा जाय तो उसके परिचय को इतने रूपों में दिया जा सकता है कि जिसकी कोई सीमा नहीं । सृष्टि में जो विविध योनियाँ हैं अगर उनकी दृष्टि से विचार करके देखें तो एक परिचय है कि व्यक्ति 'मनुष्य' है । और अगर व्यक्ति यह मान ले कि मैं मनुष्य हूँ तो उसके मार्ग तथा धर्म का निर्णय करना अत्यंत सरल है । क्योंकि यदि मनुष्य है तो मानव के जो लक्षण और धर्म बताये गये हैं वे सब उसके जीवन में होने चाहिए । लेकिन व्यक्ति का परिचय यहीं समाप्त नहीं हो जाता है क्योंकि मानव के सन्दर्भ के साथ-साथ देश के सन्दर्भ से भी व्यक्ति का परिचय दिया जाता है । जैसे कि यहाँ के रहने वालों को हम कहेंगे कि ये भारतवासी हैं । इस प्रकार एक परिचय हुआ कि 'मनुष्य' है, दूसरा परिचय हुआ कि यह इस देश का निवासी है । पर इतने से ही परिचय समाप्त नहीं हो गया । अगर धर्म की दृष्टि से विचार करें तो व्यक्ति का परिचय भिन्न-भिन्न धर्मों के नाम से दिया जाता है । उस धर्म-विशेष में भी अगर वर्ण-भेद है तो फिर यह परिचय दिया जायेगा कि यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र है । और अगर आश्रम की दृष्टि से परिचय दिया जाय तो कहा जायेगा कि ये ब्रह्मचारी हैं, गृहस्थ हैं, वानप्रस्थी अथवा सन्यासी हैं । और यदि संबंधों की दृष्टि से विचार करके देखें तो हम लोगों के परिचय इतने रूप में बदल जाते हैं कि उनकी भी गणना कर पाना कठिन है । कहीं पिता के रूप में, कहीं भाई के रूप में तो कहीं पति के रूप में । इस प्रकार एक ही व्यक्ति के साथ परिचय के रूप में अनेक शब्द जुड़े हुए हैं । ऐसी परिस्थिति में समस्या यह है कि व्यक्ति अपने लिए किस मार्ग का चुनाव करें ?
     ......आगे कल .....

Thursday, 9 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में इस युग की बड़ी आलोचना की गयी है, जिसमें हम और आप रहते हैं । आप इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि हमारे यहाँ काल का विभाजन चार नामों से किया गया है - सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग । वर्तमान युग का नाम पौराणिक तथा रामचरितमानस की भाषा में कलियुग है । उत्तरकाण्ड में कलियुग के लक्षणों का विस्तार से वर्णन करते हुए, उसमें एक सूत्र मार्ग के सन्दर्भ में बताया गया है । कलियुग में प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि की स्वतंत्रता पर बड़ा बल देता है । और उसका आग्रह है कि मैं जिस मार्ग को ठीक समझता हूँ, वही मेरे लिए उपयुक्त है तथा उसी मार्ग पर मैं चलूँगा । इस पंक्ति का सांकेतिक तात्पर्य यह बताना है कि मार्ग के निर्णय के संबंध में व्यक्ति और ईश्वर में क्या अन्तर है ? ईश्वर के लिए यद्यपि मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है । पर भगवान श्रीराघवेन्द्र से महर्षि भरद्वाज ने जब यह कहा कि आपके लिए तो सभी मार्ग उपयुक्त है तो प्रभु ने संकेतभरी दृष्टि से देखा । प्रभु का संकेत था कि महाराज ! व्यक्ति का स्वभाव ऐसा पाठ ले लेने का है कि जिसके द्वारा उसकी उत्छृंखलता का, उसकी मनमानी करने की वृत्ति का पोषण हो । तो यदि आप मुझे यह स्वतंत्रता दे देंगे कि मुझे जो मार्ग अच्छा लगे मैं उसी पर चलूँ, तो भविष्य में इस घटना को सुनने वाले जो व्यक्ति होंगे, वे इससे यह शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं कि जैसे भगवान श्रीराम को स्वतंत्रता है कि वे चाहे जिस मार्ग से चले, उसी प्रकार हमें भी यह स्वतंत्रता है कि हम चाहे जिस मार्ग से चलें । इसलिए भगवान श्रीराघवेन्द्र का अभिप्राय यह है कि मार्ग के सन्दर्भ में महापुरुषों से जिज्ञासा करनी चाहिए । क्यों करनी चाहिए ? उसका एक विशेष कारण है ।

Wednesday, 8 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सुग्रीव का चरित्र हम सब के जीवन का एक पक्ष है । मानो भगवान श्रीराघवेन्द्र जीव से कहते हैं कि तुम जहाँ हो मुझे वहीं से प्रसन्न करने की चेष्टा करो, वहीं से साधना प्रारंभ करो । अगर सही मार्ग को छोड़कर तुम केवल सुनी-सुनाई निष्कामता की ऊँची भाषा बोलने लगे तो यही दुष्परिणाम होगा । इसका मूलतत्व है कि एक ही लक्ष्य होने पर भी, आप और हम जहाँ बैठे हों वहीं से ही साधना प्रारंभ करें । भगवान श्रीराघवेन्द्र भी भरद्वाज जी से पूछते हैं - महाराज ! यह तो आप ही बताइए कि मैं कहाँ बैठा हुआ हूँ, मुझे किस मार्ग से चलना चाहिए । मुनि जी बहुत हँसकर बोले - प्रभु ! अब तो बड़ी कठिनाई आ गयी । क्योंकि क्या बताऊँ कि तुम कहाँ बैठे हो तथा किस मार्ग से चलो । वस्तुतः भगवान के जीवन में समग्र मार्गों की सार्थकता है पर इस समय वे जीव के लिए नर-नाट्य कर रहे हैं कि जीव अपने सही मार्ग का चुनाव कर सके ।

Tuesday, 7 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

.....कल से आगे......
सुग्रीव से भगवान ने कहा - अच्छा भई ! पहले तुम थोड़ी गर्जना करो । इस वाक्य को सुनकर सुग्रीव चक्कर में पड़ गये । उन्होंने कहा - महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु ने कहा - मैं । और लड़ेगा कौन ? प्रभु बोले - लड़ोगे तुम । सुग्रीव ने कहा - प्रभु ! यह तो बड़ी विचित्र सी बात है, क्योंकि जब आप मारेंगे तो आप लड़िये, मैं क्यों लड़ूँ ? किन्तु भगवान ने कहा - न ! लड़ोगे तुम और मारुँगा मैं । आगे चलकर वर्णन आता है कि सुग्रीव और बालि लड़े । बालि ने कसकर मुक्का मारा । और पिटने के पश्चात रुआँसे होकर सुग्रीव भगवान राम के पास आये, और लगे प्रभु को उलाहना देने कि आपने तो कहा था कि मैं बालि को मारुँगा । प्रभु ने तुरन्त मुस्कराकर कहा - मित्र ! तुम दोनों भाई इतने एक जैसे लगे कि मैं तो पहचान ही नहीं पाया । क्या सचमुच भगवान बालि - सुग्रीव को नहीं पहचान रहे थे ? वस्तुतः भगवान का अभिप्राय था कि जब तुम शत्रु-मित्र से परे हो गये तो फिर मैं कैसे पहचान पाऊँ कि कौन शत्रु और कौन मित्र है । प्रभु का तात्पर्य था - मित्र ! वह भाषा मत बोलो जो तुम्हारी नहीं है । लक्ष्मण जी बोलते हैं, तो लक्ष्मण जी किस नगर के निवासी हैं । - वे तो सचमुच देह नगर और गेह नगर के ऊपर उठ गये हैं । और जो देह तथा गेह नगर से ऊपर उठ चुका है उसकी भाषा भिन्न है, पर जो देह और गेह नगर में बैठा हुआ है, उससे भगवान कहते हैं - मित्र ! पहले देह-गेह के नाते मित्रता करो । पहले तुम्हारा राज्य मिल जाय, तुम्हारी पत्नी तुम्हें मिल जाय । सुग्रीव बेचारे समझ गये । तुरन्त भगवान जी से कहा - महाराज ! अभी जो शब्द मैंने अपने भाषण में कहे थे वे मैं वापस लेता हूँ । प्रभु ने जानना चाहा कि अब तुम्हारा क्या विचार है ? बोले महाराज ! - यह मेरा भाई नहीं, काल है । भगवान ने कहा - हाँ ! अब ठीक है । अब तुम वह बोल रहे हो जो तुम्हें बोलना चाहिए । और तब भगवान सुग्रीव के गले में माला पहनाते हैं, बालि का वध करते हैं । सुग्रीव को राज्य दिलाते हैं ।

Monday, 6 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सुग्रीव जब भगवान राम के समक्ष बहुत ऊँची भाषा बोलने लगे, भगवान को लगा कि मित्र इतनी ऊँची उड़ान पर पहुँच गया है । और प्रभु को यह सोचकर हँसी आयी कि मैं तो ऊपर से उतर कर नीचे आ गया और यह नीचे से ऊपर चला गया । अब भला बराबरी कैसे बनेगी ? या तो जब मैं ऊपर था तब यह ऊपर आ जाता, तब हम दोनों की बराबरी हो जाती, अथवा जब मैं इसके स्तर पर उतर आया तो यह भी यहीं पर रहता । सुग्रीव भगवान से कहते हैं कि शत्रु-मित्र का भेद मिथ्या है, वस्तुतः यह तो धृष्टता की पराकाष्ठा है । क्योंकि भगवान तो सर्वज्ञ हैं, क्या उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है ? इसलिए गोस्वामीजी ने लिखा कि - बन्दर की वैराग्य भरी वाणी सुनकर भगवान हँसे । मानो व्यंग्य यह था कि जैसे बन्दर एक डाली से दूसरे डाली पर चला जाता है, उसको समझने वाला व्यक्ति जानता है कि यह तो बन्दर की छलांग है । इसी तरह आज सुग्रीवरूपी बन्दर की छलाँग जरा लम्बी लग गयी, अयोध्याकाण्ड में लक्ष्मण जी भी यही कहते हैं कि प्रभु ! मैं किसी को नहीं जानता और यहाँ पर सुग्रीव कहते हैं कि यह सब कुछ नहीं है । किन्तु भगवान श्रीराम मुस्कराकर कहते हैं - मित्र ! तुमने तो बहुत बढ़िया बात कही है, पर मेरी भी बात झूठी नहीं होगी । सुग्रीव ने इसका सही अर्थ नहीं लिया । उन्होंने कहा - प्रभु ! लगता है आपको अपने सत्य की चिन्ता हो गयी है कि अगर आप बालि को नहीं मारेंगे तो आपका वचन झूठा हो जायेगा, और अगर आपको अपना सत्य बचाना हो तो बालि से विरोध कीजिए, मेरे मन में तो ज्ञान हो गया है, वैराग्य हो गया है । इसीलिए भगवान ने थोड़ा सा खेल करके दिखा दिया कि तुम तो नकली बात बोल रहे हो ।
     ......आगे कल .....

Sunday, 5 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम से मित्रता होने के पश्चात सुग्रीव जो भाषा बोलने लगे वह श्री लक्ष्मण वाली भाषा थी, श्री हनुमान जी की भाषा थी । यद्यपि बैठे थे देह नगर में, पर बोल रहे थे विदेह नगर की भाषा । भगवान श्री राघवेन्द्र ने ज्यों ही कहा - सुग्रीव ! घबराओ नहीं, बालि का वध मैं एक ही बाण से करुँगा, उसको कोई बचाने वाला नहीं है । बस प्रभु का वाक्य सुनते ही अचानक सुग्रीव नयी भाषा बोलने लगे - महाराज ! शत्रु-मित्र यह सब तो माया का खेल है, परमार्थ तत्व नहीं है । भगवान तो कृपा करके कह रहे थे कि अच्छा सुग्रीव ! तुम्हारे शत्रु को मारकर हम तुम्हारी पत्नी को मिला देंगे । पर सुग्रीव ने कहा - नहीं, महाराज ! जो कृपा आप कर रहे हैं पत्नी दिला देने की, शत्रु को मार देने की, यह मुझे नहीं चाहिए । प्रभु ने मुस्कराकर देखा । मानो जानना चाहा कि तब फिर कौन-सी कृपा चाहिए ? सुग्रीव ने कहा, महाराज ! अब तो बस, सब कुछ छोड़कर भजन करें । अब आप देखिए कि काकभुशुण्डि जी को तो भगवान उपदेश दे रहे हैं - सब कुछ छोड़कर मेरा भजन करो । पर जब सुग्रीव कहते हैं कि मैं सब कुछ छोड़कर भजन करना चाहता हूँ तो भगवान राम ने सुग्रीव की प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया । इस पर यदि आप विचार करें तो आपको एक नया सूत्र प्राप्त होगा । यह प्रसंग का सीधा सा अर्थ यह है कि आप अधिक ऊँची बात सुनकर दुहराने के चक्कर में बिल्कुल मत पड़िये ।

Saturday, 4 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सुग्रीव को यद्यपि हनुमान जी ने प्रभु से मिलाया पर हनुमान जी स्वयं चलकर प्रभु के पास आये और सुग्रीव के पास स्वयं प्रभु चलकर गये । अगर चरित्र की दृष्टि से देखें तो हनुमान जी का चरित्र इतना ऊँचा है कि स्वयं उनके पास प्रभु को जाना चाहिए, और सुग्रीव के चरित्र में इतनी कमी है कि सुग्रीव को प्रभु के पास जाना चाहिए । पर प्रभु ने जो कार्य किया वह भौतिक दृष्टि से अटपटा सा प्रतीत होता है । इसका सांकेतिक तात्पर्य है कि जो समर्थ है वह चलकर आये और जो असमर्थ है प्रभु स्वयं उसके पास जायँ । और यही संसार का भी नियम है । क्योंकि घर में यदि कोई अस्वस्थ पड़ा हुआ है और वह आपको देखकर उठकर प्रणाम न करे, तो क्या आप रुठ जायेंगे कि मुझे देखकर खड़ा नहीं हुआ, बड़ा अनुशासनविहिन है वह व्यक्ति ? उस समय आप रुष्ट नहीं होते क्योंकि आप अस्वस्थ व्यक्ति से वह आशा नहीं करते हैं जो स्वस्थ से करते हैं । और जब आप इतने उदार हैं कि सबसे एक ही आशा नहीं रखते तो क्या हमारे प्रभु ही इतने अनुदार हैं कि वे सबको एक ही कसौटी पर कस कर देखेंगे ?

Friday, 3 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

आप जिस कक्षा में हैं उसी के अनुसार उत्तर दीजियेगा तब तो पास होंगे लेकिन अगर कहीं दूसरी कक्षा का उत्तर आपने दे दिया, तब आप उत्तीर्ण नहीं होंगे । भले ही वह उत्तर कितना भी बढ़िया क्यों न हो । जैसे 'क' अक्षर है । तो प्रथम कक्षा में पढ़ाया जायेगा कि 'क' का अर्थ है 'कबूतर' । और आगे पढ़िए तो बताया जाता है कि 'क' अर्थ है 'जल' । 'कमल' शब्द भी इसी 'क' से बना हुआ है । और आगे चलकर कहा गया कि 'क' माने 'ब्रह्म' । इस प्रकार 'क' का अन्तिम अर्थ है 'ब्रह्म' । पहली कक्षा के विद्यार्थी ने कहीं से सुन लिया कि 'क' माने 'ब्रह्म' । और अगर अध्यापक जी के 'क' माने पूछने पर उसने कह दिया - 'ब्रह्म' तो गुरुजी पास करेंगे कि फेल ? वह तो जब कबूतर कहेगा तभी पास होगा, ब्रह्म - ब्रह्म कहने पर पास नहीं होगा । और भई ! कबूतर से ब्रह्म तक पहुँचने में तो समय लगेगा । इसलिए पहले कबूतर तो समझ लें ।

Thursday, 2 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम ने अयोध्या से विदा करते समय अंगद को ह्रदय से लगा लिया तथा वस्त्र धारण कराने के पश्चात कहा - अंगद ! अब तुम जाओ । और अंगद चले गये, तब बड़ी अनोखी सी बात आती है कि हनुमान जी भी चुपचाप चल पड़े, वे कुछ बोले ही नहीं । श्री भरत जी और श्री लक्ष्मण जी तो बड़े आश्चर्य से देखते रह गये । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को आशा थी कि हनुमान जी यही कहेंगे कि मुझे अयोध्या में ही रहने की आज्ञा दीजिए । पर हनुमान जी ने एक बार भी प्रभु से नहीं कहा । यद्यपि सबकी विदाई तो हुई पर उनकी विदाई नहीं हुयी किन्तु तब भी वे चल पड़े । क्योंकि श्री हनुमान जी की शैली ही सर्वथा भिन्न है और इसी कार्य से हनुमान जी के चरित्र की महानता का पता चलता है । हनुमानजी महान बाल ब्रह्मचारी हैं और सुग्रीव जी उनकी तुलना में विषयी हैं, होना तो यह चाहिए था कि सुग्रीव हनुमान जी के चरणों में गिरें, पर यहाँ पर गोस्वामीजी ने कहा, नहीं - हनुमान जी सुग्रीव के चरणों में गिर गये और प्रार्थना करते हुए बोले - महाराज ! आपकी कृपा से ही मुझे भगवान मिले । क्योंकि देखा तो पहले आपने ही था भगवान को । अगर आपने मुझे न भेजा होता तो मुझे प्रभु कहाँ से मिलते । इसलिए मैं चाहता हूँ कि अगर आप आज्ञा दें तो मैं दस दिन तक प्रभु के चरणों की सेवा में रुक जाऊँ । सुग्रीव की आँखों में आँसू आ गये । उन्होंने तुरन्त हनुमान जी को ह्रदय से लगाकर कहा - सचमुच आप तो पुण्य-पुंज हैं, आप जाकर कृपानिधान प्रभु की सेवा कीजिए । और जब जाने लगे हनुमान जी, तब अंगद ने हाथ पकड़कर कहा - मैं आपसे बार-बार प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु को मेरी याद दिलाते रहियेगा । हनुमान जी ने लौटकर जब अंगद का प्रेम प्रभु को सुनाया तो लिखा हुआ है - अंगद के प्रेम को सुनकर भगवान मग्न हो गये । बड़ी विचित्र सी बात है कि अंगद के प्रेम में तो मगन हो रहे हैं, और अंगद को बलपूर्वक विदा कर दिया । हनुमान जी को विदा क्यों नहीं किया ? इसका अभिप्राय है कि भगवान यह जानते हैं कि हनुमान जी देह और गेह से ऊपर उठ चुके हैं पर अंगद और सुग्रीव देह-नगर से ऊपर उठे हुए नहीं हैं ।

Wednesday, 1 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान राम ने अयोध्या से सुग्रीव को विदा किया तो वे सरलता से चले गये । अंगद से भगवान ने कुछ नहीं कहा तो स्वयं उठकर भगवान के पास चले गये और बड़ी सुन्दर प्रार्थना करने लगे । अंगद भगवान से कहते हैं - प्रभु ! मरते समय बालि मुझे आपकी गोद में डाल गया था । तो क्या भगवान को याद नहीं था जो कि भगवान को याद दिलाया जा रहा है । पर प्रभु की विलक्षणता यह है कि वे सब जानते हैं, और जो व्यक्ति जहाँ बैठा है उससे वैसी ही बात करते हैं । अंगद जहाँ बैठे हुए हैं उनसे वही आशा करते हैं और उसी के अनुरूप उनसे प्यार करते हैं । भगवान जानते हैं कि अंगद कहीं अन्यत्र बैठे हुए हैं । सुग्रीव की अवस्थिति कहीं अन्यत्र है । हनुमान जी की अवस्थिति सर्वदा पृथक है । और जो जहाँ है उसी के अनुसार यदि अपने लिए सही मार्ग वह चुनेगा तब तो ठीक है पर अगर कहीं वह उस भाषा को बोलेगा जो दूसरी अवस्थिति की है, तब कठिनाई होगी । आप बैठे हुए हैं शरीर नगर में और भाषा बोल रहे हैं वेदान्त नगर की, तो वह भाषा बिल्कुल सार्थक नहीं होगी ।