सुग्रीव को यद्यपि हनुमान जी ने प्रभु से मिलाया पर हनुमान जी स्वयं चलकर प्रभु के पास आये और सुग्रीव के पास स्वयं प्रभु चलकर गये । अगर चरित्र की दृष्टि से देखें तो हनुमान जी का चरित्र इतना ऊँचा है कि स्वयं उनके पास प्रभु को जाना चाहिए, और सुग्रीव के चरित्र में इतनी कमी है कि सुग्रीव को प्रभु के पास जाना चाहिए । पर प्रभु ने जो कार्य किया वह भौतिक दृष्टि से अटपटा सा प्रतीत होता है । इसका सांकेतिक तात्पर्य है कि जो समर्थ है वह चलकर आये और जो असमर्थ है प्रभु स्वयं उसके पास जायँ । और यही संसार का भी नियम है । क्योंकि घर में यदि कोई अस्वस्थ पड़ा हुआ है और वह आपको देखकर उठकर प्रणाम न करे, तो क्या आप रुठ जायेंगे कि मुझे देखकर खड़ा नहीं हुआ, बड़ा अनुशासनविहिन है वह व्यक्ति ? उस समय आप रुष्ट नहीं होते क्योंकि आप अस्वस्थ व्यक्ति से वह आशा नहीं करते हैं जो स्वस्थ से करते हैं । और जब आप इतने उदार हैं कि सबसे एक ही आशा नहीं रखते तो क्या हमारे प्रभु ही इतने अनुदार हैं कि वे सबको एक ही कसौटी पर कस कर देखेंगे ?
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