सुग्रीव का चरित्र हम सब के जीवन का एक पक्ष है । मानो भगवान श्रीराघवेन्द्र जीव से कहते हैं कि तुम जहाँ हो मुझे वहीं से प्रसन्न करने की चेष्टा करो, वहीं से साधना प्रारंभ करो । अगर सही मार्ग को छोड़कर तुम केवल सुनी-सुनाई निष्कामता की ऊँची भाषा बोलने लगे तो यही दुष्परिणाम होगा । इसका मूलतत्व है कि एक ही लक्ष्य होने पर भी, आप और हम जहाँ बैठे हों वहीं से ही साधना प्रारंभ करें । भगवान श्रीराघवेन्द्र भी भरद्वाज जी से पूछते हैं - महाराज ! यह तो आप ही बताइए कि मैं कहाँ बैठा हुआ हूँ, मुझे किस मार्ग से चलना चाहिए । मुनि जी बहुत हँसकर बोले - प्रभु ! अब तो बड़ी कठिनाई आ गयी । क्योंकि क्या बताऊँ कि तुम कहाँ बैठे हो तथा किस मार्ग से चलो । वस्तुतः भगवान के जीवन में समग्र मार्गों की सार्थकता है पर इस समय वे जीव के लिए नर-नाट्य कर रहे हैं कि जीव अपने सही मार्ग का चुनाव कर सके ।
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