.....कल से आगे......
सुग्रीव से भगवान ने कहा - अच्छा भई ! पहले तुम थोड़ी गर्जना करो । इस वाक्य को सुनकर सुग्रीव चक्कर में पड़ गये । उन्होंने कहा - महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु ने कहा - मैं । और लड़ेगा कौन ? प्रभु बोले - लड़ोगे तुम । सुग्रीव ने कहा - प्रभु ! यह तो बड़ी विचित्र सी बात है, क्योंकि जब आप मारेंगे तो आप लड़िये, मैं क्यों लड़ूँ ? किन्तु भगवान ने कहा - न ! लड़ोगे तुम और मारुँगा मैं । आगे चलकर वर्णन आता है कि सुग्रीव और बालि लड़े । बालि ने कसकर मुक्का मारा । और पिटने के पश्चात रुआँसे होकर सुग्रीव भगवान राम के पास आये, और लगे प्रभु को उलाहना देने कि आपने तो कहा था कि मैं बालि को मारुँगा । प्रभु ने तुरन्त मुस्कराकर कहा - मित्र ! तुम दोनों भाई इतने एक जैसे लगे कि मैं तो पहचान ही नहीं पाया । क्या सचमुच भगवान बालि - सुग्रीव को नहीं पहचान रहे थे ? वस्तुतः भगवान का अभिप्राय था कि जब तुम शत्रु-मित्र से परे हो गये तो फिर मैं कैसे पहचान पाऊँ कि कौन शत्रु और कौन मित्र है । प्रभु का तात्पर्य था - मित्र ! वह भाषा मत बोलो जो तुम्हारी नहीं है । लक्ष्मण जी बोलते हैं, तो लक्ष्मण जी किस नगर के निवासी हैं । - वे तो सचमुच देह नगर और गेह नगर के ऊपर उठ गये हैं । और जो देह तथा गेह नगर से ऊपर उठ चुका है उसकी भाषा भिन्न है, पर जो देह और गेह नगर में बैठा हुआ है, उससे भगवान कहते हैं - मित्र ! पहले देह-गेह के नाते मित्रता करो । पहले तुम्हारा राज्य मिल जाय, तुम्हारी पत्नी तुम्हें मिल जाय । सुग्रीव बेचारे समझ गये । तुरन्त भगवान जी से कहा - महाराज ! अभी जो शब्द मैंने अपने भाषण में कहे थे वे मैं वापस लेता हूँ । प्रभु ने जानना चाहा कि अब तुम्हारा क्या विचार है ? बोले महाराज ! - यह मेरा भाई नहीं, काल है । भगवान ने कहा - हाँ ! अब ठीक है । अब तुम वह बोल रहे हो जो तुम्हें बोलना चाहिए । और तब भगवान सुग्रीव के गले में माला पहनाते हैं, बालि का वध करते हैं । सुग्रीव को राज्य दिलाते हैं ।
सुग्रीव से भगवान ने कहा - अच्छा भई ! पहले तुम थोड़ी गर्जना करो । इस वाक्य को सुनकर सुग्रीव चक्कर में पड़ गये । उन्होंने कहा - महाराज ! बालि को मारेगा कौन ? प्रभु ने कहा - मैं । और लड़ेगा कौन ? प्रभु बोले - लड़ोगे तुम । सुग्रीव ने कहा - प्रभु ! यह तो बड़ी विचित्र सी बात है, क्योंकि जब आप मारेंगे तो आप लड़िये, मैं क्यों लड़ूँ ? किन्तु भगवान ने कहा - न ! लड़ोगे तुम और मारुँगा मैं । आगे चलकर वर्णन आता है कि सुग्रीव और बालि लड़े । बालि ने कसकर मुक्का मारा । और पिटने के पश्चात रुआँसे होकर सुग्रीव भगवान राम के पास आये, और लगे प्रभु को उलाहना देने कि आपने तो कहा था कि मैं बालि को मारुँगा । प्रभु ने तुरन्त मुस्कराकर कहा - मित्र ! तुम दोनों भाई इतने एक जैसे लगे कि मैं तो पहचान ही नहीं पाया । क्या सचमुच भगवान बालि - सुग्रीव को नहीं पहचान रहे थे ? वस्तुतः भगवान का अभिप्राय था कि जब तुम शत्रु-मित्र से परे हो गये तो फिर मैं कैसे पहचान पाऊँ कि कौन शत्रु और कौन मित्र है । प्रभु का तात्पर्य था - मित्र ! वह भाषा मत बोलो जो तुम्हारी नहीं है । लक्ष्मण जी बोलते हैं, तो लक्ष्मण जी किस नगर के निवासी हैं । - वे तो सचमुच देह नगर और गेह नगर के ऊपर उठ गये हैं । और जो देह तथा गेह नगर से ऊपर उठ चुका है उसकी भाषा भिन्न है, पर जो देह और गेह नगर में बैठा हुआ है, उससे भगवान कहते हैं - मित्र ! पहले देह-गेह के नाते मित्रता करो । पहले तुम्हारा राज्य मिल जाय, तुम्हारी पत्नी तुम्हें मिल जाय । सुग्रीव बेचारे समझ गये । तुरन्त भगवान जी से कहा - महाराज ! अभी जो शब्द मैंने अपने भाषण में कहे थे वे मैं वापस लेता हूँ । प्रभु ने जानना चाहा कि अब तुम्हारा क्या विचार है ? बोले महाराज ! - यह मेरा भाई नहीं, काल है । भगवान ने कहा - हाँ ! अब ठीक है । अब तुम वह बोल रहे हो जो तुम्हें बोलना चाहिए । और तब भगवान सुग्रीव के गले में माला पहनाते हैं, बालि का वध करते हैं । सुग्रीव को राज्य दिलाते हैं ।
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