Sunday, 5 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम से मित्रता होने के पश्चात सुग्रीव जो भाषा बोलने लगे वह श्री लक्ष्मण वाली भाषा थी, श्री हनुमान जी की भाषा थी । यद्यपि बैठे थे देह नगर में, पर बोल रहे थे विदेह नगर की भाषा । भगवान श्री राघवेन्द्र ने ज्यों ही कहा - सुग्रीव ! घबराओ नहीं, बालि का वध मैं एक ही बाण से करुँगा, उसको कोई बचाने वाला नहीं है । बस प्रभु का वाक्य सुनते ही अचानक सुग्रीव नयी भाषा बोलने लगे - महाराज ! शत्रु-मित्र यह सब तो माया का खेल है, परमार्थ तत्व नहीं है । भगवान तो कृपा करके कह रहे थे कि अच्छा सुग्रीव ! तुम्हारे शत्रु को मारकर हम तुम्हारी पत्नी को मिला देंगे । पर सुग्रीव ने कहा - नहीं, महाराज ! जो कृपा आप कर रहे हैं पत्नी दिला देने की, शत्रु को मार देने की, यह मुझे नहीं चाहिए । प्रभु ने मुस्कराकर देखा । मानो जानना चाहा कि तब फिर कौन-सी कृपा चाहिए ? सुग्रीव ने कहा, महाराज ! अब तो बस, सब कुछ छोड़कर भजन करें । अब आप देखिए कि काकभुशुण्डि जी को तो भगवान उपदेश दे रहे हैं - सब कुछ छोड़कर मेरा भजन करो । पर जब सुग्रीव कहते हैं कि मैं सब कुछ छोड़कर भजन करना चाहता हूँ तो भगवान राम ने सुग्रीव की प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया । इस पर यदि आप विचार करें तो आपको एक नया सूत्र प्राप्त होगा । यह प्रसंग का सीधा सा अर्थ यह है कि आप अधिक ऊँची बात सुनकर दुहराने के चक्कर में बिल्कुल मत पड़िये ।

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