Friday, 17 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

पहले हम यह निर्णय कर लें कि हम कहाँ हैं ? और कहाँ होने का निर्णय सन्त के द्वारा होने के पश्चात निर्णय करें कि अगर हम कहाँ हैं तो फिर हमारे कर्तव्य का स्वरूप क्या है ? हमारी साधना का स्वरूप क्या है ? और जब व्यक्ति उसी केन्द्र के आधार पर अपनी साधना और कर्तव्य का निर्णय करने का प्रयास करेगा, तब वह लक्ष्य तक पहुँच जायेगा । उसको अपने चरम उद्देश्य की उपलब्धि हो जायेगी । पर अगर व्यक्ति अपने बारे में यह निर्णय नहीं कर पावेगा कि मेरा मूल स्थान कौन सा है, मेरा वास्तविक परिचय क्या है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जैसे अपना घर यदि न हो तो व्यक्ति चारों ओर भटकता रहता है । इसी प्रकार व्यक्ति के  जीवन में भी केवल भटकाव की स्थिति बनी रहेगी । इसीलिए हम अपने केन्द्र को पहचानने की चेष्टा करें ।

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