Tuesday, 21 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

अहिल्या को महर्षि गौतम ने शाप दिया और कबन्ध को दुर्वासा ने शाप दिया । पर दोनों की दृष्टि में आपको भिन्नता दिखाई देगी । अहिल्या जब भगवान के चरणों के स्पर्श से चेतन हुई तो कह सकती थी कि महाराज ! आप बड़े सज्जन हैं, मेरे पति तो बड़े क्रोधी हैं । क्योंकि एक छोटे से अपराध पर उन्होंने मुझे इतना बड़ा शाप दे दिया । अगर ऐसी बात अहिल्या कहती तो गौतम के व्यवहार की दृष्टि से कोई अटपटी बात नहीं होती । लेकिन अहिल्या की दृष्टि कितनी सुन्दर है । अहिल्या को उस समय महर्षि गौतम की याद आयी और तुरंत उसने भगवान राम के चरणों में प्रणाम करके कहा - प्रभु ! मैं आपकी कृतज्ञ हूँ ही लेकिन अपने पतिदेव की और भी अधिक कृतज्ञ हूँ । क्योंकि - महाराज ! वरदान का लक्ष्य अन्त में भगवान की प्राप्ति ही तो है । तो जो ईश्वर, वरदान से मिलता है अगर शाप से मिल जाए, तब तो वरदान की अपेक्षा शाप ही अच्छा है । मेरे पतिदेव ने बड़ी कृपा की जो मुझे शाप दे दिया । और जब भगवान राम अहिल्या की इस प्रकार की वाणी सुनते हैं तो समझ लेते हैं कि इसकी दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं है बल्कि गुण दर्शन पर है ।

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