भगवान राम ने अयोध्या से विदा करते समय अंगद को ह्रदय से लगा लिया तथा वस्त्र धारण कराने के पश्चात कहा - अंगद ! अब तुम जाओ । और अंगद चले गये, तब बड़ी अनोखी सी बात आती है कि हनुमान जी भी चुपचाप चल पड़े, वे कुछ बोले ही नहीं । श्री भरत जी और श्री लक्ष्मण जी तो बड़े आश्चर्य से देखते रह गये । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को आशा थी कि हनुमान जी यही कहेंगे कि मुझे अयोध्या में ही रहने की आज्ञा दीजिए । पर हनुमान जी ने एक बार भी प्रभु से नहीं कहा । यद्यपि सबकी विदाई तो हुई पर उनकी विदाई नहीं हुयी किन्तु तब भी वे चल पड़े । क्योंकि श्री हनुमान जी की शैली ही सर्वथा भिन्न है और इसी कार्य से हनुमान जी के चरित्र की महानता का पता चलता है । हनुमानजी महान बाल ब्रह्मचारी हैं और सुग्रीव जी उनकी तुलना में विषयी हैं, होना तो यह चाहिए था कि सुग्रीव हनुमान जी के चरणों में गिरें, पर यहाँ पर गोस्वामीजी ने कहा, नहीं - हनुमान जी सुग्रीव के चरणों में गिर गये और प्रार्थना करते हुए बोले - महाराज ! आपकी कृपा से ही मुझे भगवान मिले । क्योंकि देखा तो पहले आपने ही था भगवान को । अगर आपने मुझे न भेजा होता तो मुझे प्रभु कहाँ से मिलते । इसलिए मैं चाहता हूँ कि अगर आप आज्ञा दें तो मैं दस दिन तक प्रभु के चरणों की सेवा में रुक जाऊँ । सुग्रीव की आँखों में आँसू आ गये । उन्होंने तुरन्त हनुमान जी को ह्रदय से लगाकर कहा - सचमुच आप तो पुण्य-पुंज हैं, आप जाकर कृपानिधान प्रभु की सेवा कीजिए । और जब जाने लगे हनुमान जी, तब अंगद ने हाथ पकड़कर कहा - मैं आपसे बार-बार प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु को मेरी याद दिलाते रहियेगा । हनुमान जी ने लौटकर जब अंगद का प्रेम प्रभु को सुनाया तो लिखा हुआ है - अंगद के प्रेम को सुनकर भगवान मग्न हो गये । बड़ी विचित्र सी बात है कि अंगद के प्रेम में तो मगन हो रहे हैं, और अंगद को बलपूर्वक विदा कर दिया । हनुमान जी को विदा क्यों नहीं किया ? इसका अभिप्राय है कि भगवान यह जानते हैं कि हनुमान जी देह और गेह से ऊपर उठ चुके हैं पर अंगद और सुग्रीव देह-नगर से ऊपर उठे हुए नहीं हैं ।
No comments:
Post a Comment