हनुमान जी ने सुग्रीव से जब प्रभु की मित्रता करायी और सुग्रीव को प्रभु ने ह्रदय से लगाया तब सुग्रीव जी ने भगवान राम की ओर देखकर कहा कि प्रभु ! आप मेरे कर्तव्य का उपदेश मुझे दीजिए । आप बताइए कि मैं आपकी भक्ति कैसे करुँ, मैं आपको कैसे प्रसन्न करुँ ? उस समय भगवान राम ने जो उपदेश सुग्रीव जी को दिया उस पर यदि आपने ध्यान दिया हो तो आपको यह बड़ी विचित्र सी बात लगेगी कि वह शब्द तो प्रभु हनुमान जी से, लक्ष्मण जी अथवा भरत जी से कभी नहीं बोले जिस शब्द का प्रयोग प्रभु सुग्रीव से करते हैं । भगवान ने कहा - सुग्रीव ! तुम तो मेरे मित्र हो इसलिए मैं चाहूँगा कि मित्र का जो धर्म है तुम उसका अपने जीवन में पालन करो । सुग्रीव ने पूछा - महाराज ! मित्र का धर्म क्या है ? तो भगवान ने पहला वाक्य यही कहा कि - मित्र सुग्रीव ! मित्र का कर्तव्य है कि न तो देने में संकोच करे और न ही लेने में । और भाई ! ये लेन-देन की चर्चा रामायण में भगवान ने अगर किसी से की तो केवल सुग्रीव से । अगर कोई प्रभु से पूछ दे कि महाराज ! लोग तो कहते हैं कि देना बहुत अच्छा है और लेना बुरा । तो भगवान कहते हैं - बिल्कुल नहीं, दोनों बहुत अच्छे हैं । क्योंकि जो देने में संकोच करता है वह कृपण है और जो लेने में संकोच करता है वह अभिमानी है । सोचता है कि हम ले लेंगे तो छोटे मान लिये जायेंगे । प्रभु ने कहा - भाई ! हमारा-तुम्हारा तो मित्रता का बराबरी का नाता है इसलिए मैं जो दूँ उसे तुम लो और तुम जो दोगे मैं लूँगा ।
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