Thursday, 9 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में इस युग की बड़ी आलोचना की गयी है, जिसमें हम और आप रहते हैं । आप इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि हमारे यहाँ काल का विभाजन चार नामों से किया गया है - सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग । वर्तमान युग का नाम पौराणिक तथा रामचरितमानस की भाषा में कलियुग है । उत्तरकाण्ड में कलियुग के लक्षणों का विस्तार से वर्णन करते हुए, उसमें एक सूत्र मार्ग के सन्दर्भ में बताया गया है । कलियुग में प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि की स्वतंत्रता पर बड़ा बल देता है । और उसका आग्रह है कि मैं जिस मार्ग को ठीक समझता हूँ, वही मेरे लिए उपयुक्त है तथा उसी मार्ग पर मैं चलूँगा । इस पंक्ति का सांकेतिक तात्पर्य यह बताना है कि मार्ग के निर्णय के संबंध में व्यक्ति और ईश्वर में क्या अन्तर है ? ईश्वर के लिए यद्यपि मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है । पर भगवान श्रीराघवेन्द्र से महर्षि भरद्वाज ने जब यह कहा कि आपके लिए तो सभी मार्ग उपयुक्त है तो प्रभु ने संकेतभरी दृष्टि से देखा । प्रभु का संकेत था कि महाराज ! व्यक्ति का स्वभाव ऐसा पाठ ले लेने का है कि जिसके द्वारा उसकी उत्छृंखलता का, उसकी मनमानी करने की वृत्ति का पोषण हो । तो यदि आप मुझे यह स्वतंत्रता दे देंगे कि मुझे जो मार्ग अच्छा लगे मैं उसी पर चलूँ, तो भविष्य में इस घटना को सुनने वाले जो व्यक्ति होंगे, वे इससे यह शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं कि जैसे भगवान श्रीराम को स्वतंत्रता है कि वे चाहे जिस मार्ग से चले, उसी प्रकार हमें भी यह स्वतंत्रता है कि हम चाहे जिस मार्ग से चलें । इसलिए भगवान श्रीराघवेन्द्र का अभिप्राय यह है कि मार्ग के सन्दर्भ में महापुरुषों से जिज्ञासा करनी चाहिए । क्यों करनी चाहिए ? उसका एक विशेष कारण है ।

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