मार्ग के सन्दर्भ में यह बात कही गयी थी कि जो व्यक्ति जहाँ पर है, वहीं से उसकी यात्रा प्रारंभ होती है । वैसे स्थूल जगत में तो यह निर्णय करना कठिन नहीं है कि कौन व्यक्ति किस नगर में रहता है, पर क्या आन्तरिक जीवन में भी इतनी ही सरलता से यह निर्णय हो सकता है कि कौन सा व्यक्ति किस नगर का निवासी है ? अगर इस दृष्टि से विचार करके देखें, तो व्यक्ति के आन्तरिक जीवन की सबसे बड़ी समस्या यही है कि सही अर्थों में वह स्वयं ही नहीं समझ पाता कि मैं कहाँ हूँ ? अगर व्यक्ति के परिचय के सन्दर्भ में प्रश्न किया जाय तो हमें उसके परिचय में भी विविधता मिलेगी । एक ही व्यक्ति के परिचय के संबंध में अगर पूछा जाय तो उसके परिचय को इतने रूपों में दिया जा सकता है कि जिसकी कोई सीमा नहीं । सृष्टि में जो विविध योनियाँ हैं अगर उनकी दृष्टि से विचार करके देखें तो एक परिचय है कि व्यक्ति 'मनुष्य' है । और अगर व्यक्ति यह मान ले कि मैं मनुष्य हूँ तो उसके मार्ग तथा धर्म का निर्णय करना अत्यंत सरल है । क्योंकि यदि मनुष्य है तो मानव के जो लक्षण और धर्म बताये गये हैं वे सब उसके जीवन में होने चाहिए । लेकिन व्यक्ति का परिचय यहीं समाप्त नहीं हो जाता है क्योंकि मानव के सन्दर्भ के साथ-साथ देश के सन्दर्भ से भी व्यक्ति का परिचय दिया जाता है । जैसे कि यहाँ के रहने वालों को हम कहेंगे कि ये भारतवासी हैं । इस प्रकार एक परिचय हुआ कि 'मनुष्य' है, दूसरा परिचय हुआ कि यह इस देश का निवासी है । पर इतने से ही परिचय समाप्त नहीं हो गया । अगर धर्म की दृष्टि से विचार करें तो व्यक्ति का परिचय भिन्न-भिन्न धर्मों के नाम से दिया जाता है । उस धर्म-विशेष में भी अगर वर्ण-भेद है तो फिर यह परिचय दिया जायेगा कि यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र है । और अगर आश्रम की दृष्टि से परिचय दिया जाय तो कहा जायेगा कि ये ब्रह्मचारी हैं, गृहस्थ हैं, वानप्रस्थी अथवा सन्यासी हैं । और यदि संबंधों की दृष्टि से विचार करके देखें तो हम लोगों के परिचय इतने रूप में बदल जाते हैं कि उनकी भी गणना कर पाना कठिन है । कहीं पिता के रूप में, कहीं भाई के रूप में तो कहीं पति के रूप में । इस प्रकार एक ही व्यक्ति के साथ परिचय के रूप में अनेक शब्द जुड़े हुए हैं । ऐसी परिस्थिति में समस्या यह है कि व्यक्ति अपने लिए किस मार्ग का चुनाव करें ?
......आगे कल .....
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