आप अपने नन्हे से बालक के समक्ष क्या बनेंगे, निष्काम कि सकाम ? आपकी छोटी बच्ची खिलौने के नकली बर्तन में अगर कल्पना का हलुआ बना कर ले आये और आपको देने लगे तो क्या आप यह कहेंगे कि नहीं-नहीं मुझे भूख नहीं है ? यदि आप बुद्धिमान पिता होंगे तो उससे यही कहेंगे कि मुझे बड़ी भूख लगी थी और तुमने तो इतना बढ़िया हलुआ खिलाया कि मेरा तो पेट पूरा भर गया । भगवान राम भी सुग्रीव से यही कहते हैं कि मित्र ! यह न समझना कि मैं बड़ा हूँ और तुम छोटे हो, अरे भई हम दोनों में अन्तर ही क्या है । इसलिए आओ अब हम दोनों समझौता कर लें । क्या समझौता ? बोले मित्र ! तुम्हारी पत्नी को हम मिला देंगे और हमारी पत्नी को तुम मिला देना । मैं तुम्हें राज्य दिला दूँगा, बाद भी मुझे भी राज्य मिल जायेगा । तो भगवान राम जो इतना नीचे उतरकर बोल रहे हैं, क्या सचमुच उन्हें नीचे उतरने की आवश्यकता है ? वस्तुतः इसका अभिप्राय है कि भगवान की विशेषता यही है कि ऊपर से ऊपर भी वही हैं और नीचे से नीचे भी वही हैं । प्रभु ऊपर उठे व्यक्तियों में किसी से ज्ञान की भाषा बोलते हैं, किसी से वैराग्य की भाषा बोलते हैं, किसी से धर्म की भाषा बोलते हैं और किसी से सकामता की भाषा बोलते हैं ।
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