.....कल से आगे.....
समस्या यह है कि व्यक्ति अपने लिए किस मार्ग का चुनाव करें ? क्योंकि अगर सभी रूपों में सामंजस्य हो तब तो कठिनाई नहीं । लेकिन दिखायी यह देता है कि कभी-कभी देश के स्वार्थ में टकराहट होती है । कभी धर्म में विभिन्नता दिखायी देती है, और कभी वर्ण में भिन्नता परिलक्षित होती है । तो फिर ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति अगर अपने विषय में यह निर्णय करने चले कि वस्तुतः मैं कौन हूँ, तो इसका क्या उपाय है ? वेदान्तियों ने तो व्यक्ति का एक अलग ही परिचय दिया । उन्होंने कहा - जीव साक्षात ब्रह्म है । अब जीव साक्षात ब्रह्म है, जीव मनुष्य है, जीव भारतवासी है, जीव हिन्दु है या जीव ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र है ? और फिर ब्राह्मण भी अनेक रुपों में बँटा हुआ है । इस प्रकार सचमुच व्यक्ति के सामने यह बहुत बड़ी समस्या आ जाती है कि वह इनमें से केन्द्र किसको बनाये ? स्वयं अपने लिए कर्तव्य तथा मार्ग का निर्णय हम करें तो किस आधार को केन्द्र बनाकर करें ? रामचरितमानस के विभिन्न चरित्र के माध्यम से हम आने वाले दिनों में इसका समाधान प्राप्त करेंगे ।
समस्या यह है कि व्यक्ति अपने लिए किस मार्ग का चुनाव करें ? क्योंकि अगर सभी रूपों में सामंजस्य हो तब तो कठिनाई नहीं । लेकिन दिखायी यह देता है कि कभी-कभी देश के स्वार्थ में टकराहट होती है । कभी धर्म में विभिन्नता दिखायी देती है, और कभी वर्ण में भिन्नता परिलक्षित होती है । तो फिर ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति अगर अपने विषय में यह निर्णय करने चले कि वस्तुतः मैं कौन हूँ, तो इसका क्या उपाय है ? वेदान्तियों ने तो व्यक्ति का एक अलग ही परिचय दिया । उन्होंने कहा - जीव साक्षात ब्रह्म है । अब जीव साक्षात ब्रह्म है, जीव मनुष्य है, जीव भारतवासी है, जीव हिन्दु है या जीव ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शुद्र है ? और फिर ब्राह्मण भी अनेक रुपों में बँटा हुआ है । इस प्रकार सचमुच व्यक्ति के सामने यह बहुत बड़ी समस्या आ जाती है कि वह इनमें से केन्द्र किसको बनाये ? स्वयं अपने लिए कर्तव्य तथा मार्ग का निर्णय हम करें तो किस आधार को केन्द्र बनाकर करें ? रामचरितमानस के विभिन्न चरित्र के माध्यम से हम आने वाले दिनों में इसका समाधान प्राप्त करेंगे ।
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