Sunday, 12 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

विनय-पत्रिका में गोस्वामीजी तथा भगवान राम का बड़ा अनोखा संवाद हुआ । गोस्वामीजी भगवान से कहने लगे कि आप से मैं संबंध जोड़ना चाहता हूँ । प्रभु ने जानना चाहा कौन सा संबंध जोड़ना चाहते हो ? तो गिनाने लगे - आप ब्रह्म हैं मैं जीव हूँ, आप स्वामी हैं मैं सेवक हूँ, आप पिता हैं मैं पुत्र हूँ, आप माँ हैं मैं बेटा हूँ, आप मेरे मित्र हैं मैं आपका मित्र हूँ । जब इतना गिना दिया तो गोस्वामीजी से भगवान ने मुस्कराकर पूछा - यह तो तुमने बड़ी सूची प्रस्तुत कर दी । किन्तु यह तो बताओ तुम हमारे और अपने बीच में इनमें से किस नाते को मानना चाहते हो ? तब गोस्वामीजी ने बड़ी चतुराई से अपनी बात भगवान के सामने कह दी - प्रभु ! आपको जो अच्छा लगे उसे आप मान लीजिए । भगवान ने कहा - बड़ी अनोखी बात है, अरे ! नाता जोड़ने के लिए तो तुम आये हो कह रहे हो कि आपको जो अच्छा लगे वह मान लीजिए । गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! मेरे सामने दो समस्याएँ हैं । पहली तो यह कि आपके और मेरे बीच जब इतने नाते हैं तो मैं यह निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि आपसे सबसे अधिक लाभ किस नाते से लिया जा सकता है । और दूसरे प्रभु ! मैं चाहता हूँ कि नाता तो मैंने गिना दिये लेकिन चुनाव आप ही करें । प्रभु ने कहा - क्यों ? गोस्वामीजी ने कहा - प्रभु ! यदि मैं आपसे कहूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ तो आप मुझे यही कह देंगे कि तुम पुत्र के कर्तव्य का पालन करो । यदि कहूँगा कि मैं मित्र हूँ तो आप कहेंगे कि मित्र के धर्म का पालन करो । और अगर मैं कहूँ कि आप गुरु हैं, तो आप कहेंगे कि शिष्य के धर्म का पालन करो । तो महाराज ! मुझे बड़ी चिन्ता यह हो गयी है कि मैं इन धर्मों का पालन कर पाऊँगा या नहीं । और आप यदि कह देंगे कि मैं तुम्हारा पिता हूँ तो मेरे ऊपर कुछ भार नहीं है । आप पिता हैं तो आप पिता के धर्म का पालन कीजिए । ऐसी स्थिति में चुनाव का भार मैं आप पर ही छोड़ देता हूँ कि इन नातों में से आप ही बता दीजिए कि आपको कौन सा नाता प्रिय लग रहा है । सांकेतिक दृष्टि से यदि कहें तो इसका अभिप्राय है कि साधना के सन्दर्भ में व्यक्ति के लिए कभी-कभी यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि ईश्वर को हम किस रूप में देखें, ईश्वर से किस संबंध का निर्वाह करें ?

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