भगवान राम ने अयोध्या से सुग्रीव को विदा किया तो वे सरलता से चले गये । अंगद से भगवान ने कुछ नहीं कहा तो स्वयं उठकर भगवान के पास चले गये और बड़ी सुन्दर प्रार्थना करने लगे । अंगद भगवान से कहते हैं - प्रभु ! मरते समय बालि मुझे आपकी गोद में डाल गया था । तो क्या भगवान को याद नहीं था जो कि भगवान को याद दिलाया जा रहा है । पर प्रभु की विलक्षणता यह है कि वे सब जानते हैं, और जो व्यक्ति जहाँ बैठा है उससे वैसी ही बात करते हैं । अंगद जहाँ बैठे हुए हैं उनसे वही आशा करते हैं और उसी के अनुरूप उनसे प्यार करते हैं । भगवान जानते हैं कि अंगद कहीं अन्यत्र बैठे हुए हैं । सुग्रीव की अवस्थिति कहीं अन्यत्र है । हनुमान जी की अवस्थिति सर्वदा पृथक है । और जो जहाँ है उसी के अनुसार यदि अपने लिए सही मार्ग वह चुनेगा तब तो ठीक है पर अगर कहीं वह उस भाषा को बोलेगा जो दूसरी अवस्थिति की है, तब कठिनाई होगी । आप बैठे हुए हैं शरीर नगर में और भाषा बोल रहे हैं वेदान्त नगर की, तो वह भाषा बिल्कुल सार्थक नहीं होगी ।
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