बड़े-बड़े महात्माओं के समक्ष भगवान राम ने जिज्ञासा प्रकट की । महर्षि भरद्वाज, महर्षि वाल्मीकि तथा महर्षि अगस्त्य सबके सामने भगवान राम ने अपना प्रश्न रखा । लेकिन जब श्रीसीता जी खो गयीं तो भगवान श्रीराम ने शबरी जी से ही कहा कि - शबरी जी ! जनकनन्दिनी श्रीसीता जी खो गयी हैं, आप बताइए कि सीता पुनः कैसे मिलेंगी । भगवान का अभिप्राय था कि ऐसा पात्र मेरी दृष्टि में शबरी से बढ़कर कोई नहीं है जो सीता जी की प्राप्ति का मार्ग बता सके । इस प्रकार साधारण सी एक नारी और शूद्र दिखायी देने वाले पात्र से भगवान श्रीराम ने सीता को प्राप्त करने का उपाय पूछा । और जो आदेश शबरी जी ने दिया भगवान श्रीराघवेन्द्र ने उसी का पालन किया । भगवान श्रीराम उनकी आज्ञा मानकर पम्पासर की ओर यात्रा करते हैं । इसका अभिप्राय है कि भगवान श्रीराम, सामने वाले व्यक्ति की अवस्थिति को देख लेते हैं और उसी के अनुरूप उससे वार्तालाप करते हैं । कबन्ध अभिमानी है तो उसको दूसरे प्रकार का उपदेश देते हैं । और शबरी जी में भक्ति तथा विनम्रता की पराकाष्ठा है, इसलिए प्रारम्भ में भगवान ने शबरी जी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया ।
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