भगवान निष्कामता में हैं यह तो हर कोई देख लेता है, पर भगवान कितने सकाम बन गये यह आप सुग्रीव के प्रसंग में देख लीजिए । सुग्रीव से जो भाषा भगवान राम बोल रहे हैं वह सकामता वाली भाषा है या निष्कामता वाली ? इस प्रसंग में भगवान ने सकामता की भाषा में पूरा उपदेश दिया । और केवल उपदेश ही नहीं दिया अपितु प्रभु कहते हैं कि घबराओ नहीं, हमारी-तुम्हारी मित्रता बिल्कुल ठीक है । आपने यह देखा कि सुग्रीव से मित्रता भगवान ने कब की ? यद्यपि अयोध्या का राज्य छोड़कर भगवान वन में बहुत पहले आ गये थे पर सुग्रीव से मित्रता करने के लिए तब आये जब श्री सीता जी खो गयी । आपने ध्यान दिया, प्रभु इतने विलम्ब से क्यों आये ? प्रभु ने मानो कहा - सुग्रीव ! हमारी और तुम्हारी दशा बिल्कुल एक जैसी है । क्योंकि तुम्हारा राज्य भी गया हुआ है और मेरा राज्य भी गया हुआ है । तुम्हारी पत्नी भी खोयी हुई है और मेरी पत्नी का भी अपहरण हो चुका है । इसलिए हममें और तुममें कोई अन्तर नहीं है । प्रभु बड़े अनोखे हैं । वे जिससे मिलते हैं बस उसी तरह बन जाते हैं । यह बन जाना ही प्रभु की उदारता है और यही तत्व सर्वत्र विद्यमान है ।
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