रामचरितमानस में बालकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक ऐसे अनेक प्रसंग आते हैं जिसमें अलग-अलग पात्रों को भगवान राम अलग-अलग उपदेश देते हुए दिखाई देते हैं । उन उपदेशों को अगर आप ध्यान से पढ़ेंगे तो उन उपदेशों में परस्पर एकता नहीं अपितु भिन्नता परिलक्षित होगी । उस भिन्नता को जो समझ नहीं पाते उन्हें उन वाक्यों को पढ़कर बड़ी विचित्र सी अनुभूति होती है । उनके मन में बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया होती है । लेकिन जो पूरे रामचरितमानस को व्यापक दृष्टि से पढ़ेगा, वह केवल भगवान के वाक्यों को नहीं देखेगा वरन भगवान ने उन वाक्यों को किसके लिए कहा है, किन संदर्भों में कहा है, यदि इस पर ध्यान देगा तो उसके मन में कोई उद्वेग नहीं होगा । आज का युग थोड़ा "संवेदनशील" हो गया है । लोगों में कई चेतनाएँ ऐसी प्रबल हो गयी हैं कि अगर एक पंक्ति भी कभी उनको ऐसी मिले तो उनको चोट पहुँचती है । उन्हें लगता है कि रामायण का यह वाक्य है ? रामायण का यह सिध्दांत है ? पर मैं यही कहूँगा कि आप भगवान श्रीराघवेन्द्र के वाक्य को उस सन्दर्भ में देखिए जिस सन्दर्भ में वे अलग-अलग पात्रों को वह वाक्य कह रहे हैं ।
No comments:
Post a Comment