Tuesday, 14 February 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान श्रीराम जब वन जाने के लिए कौसल्या के पास आये, और कौसल्या अम्बा को जब यह पता चला कि श्रीराघवेन्द्र वन जाने की आज्ञा लेने के लिए मेरे पास आये हैं तो कौसल्या अम्बा ने कहा - राघवेंद्र ! अगर तुम्हारे पिता ने वन जाने की आज्ञा दी है तो मैं आज्ञा देती हूँ कि वन मत जाओ ! वहाँ पर कौसल्या अम्बा का वाक्य यही था - जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ।। - तुम्हें माँ को बड़ा समझकर वन नहीं जाना चाहिए, क्योंकि पिता की तुलना में माँ की आज्ञा का पालन श्रेष्ठ है । परन्तु आगे माँ ने मातृत्व की इतनी सुन्दर व्याख्या की कि जिससे प्रभु के समक्ष किसी प्रकार का धर्म संकट नहीं आया । माँ ने कह दिया - पुत्र ! अगर पिता दशरथ के साथ-साथ तुम्हारी माँ कैकेयी ने भी वन जाने के लिए कहा हो तो तुम जरुर जाओ । प्रभु बड़े प्रसन्न हो गये कि चलो माँ ने ऐसा सूत्र दिया कि जिससे मेरी समस्या टल गयी । लेकिन इस पंक्ति के आधार पर यह तो कहा जा सकता है कि पिता की अपेक्षा माँ बड़ी है ।
      पिता की श्रेष्ठता सिध्द करने वाली पंक्ति भी आपको रामचरितमानस में प्राप्त हो जायेगी । श्रीभरत जब ननिहाल से लौटकर आते हैं उस समय जब गुरु वसिष्ठ उन्हें समझाने लगते हैं तो यही कहते हैं कि पिता की आज्ञा सर्वोपरि है और वे दृष्टांत भी दे देते हैं कि पिता का पद तो इतना महत्वपूर्ण है कि परशुराम जी को पिता ने आज्ञा दी तो उन्होंने अपनी माँ का वध कर दिया । अगर परशुराम ऐसा कर सकते थे तो तुम्हें तो राज्य लेने की बात को पिता की आज्ञा के रूप में स्वीकार कर ही लेना चाहिए । तो भई ! कर्तव्यों तथा मान्यताओं के टकराहट के रूप में इस प्रकार का अन्तर्द्वन्द हमारे और आपके जीवन में आता है । श्री रामचरितमानस के आश्रय से हम इसका समाधान प्राप्त कर सकते हैं ।

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